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जातकर्म संस्कार

जातकर्म संस्कार हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में जन्म के तुरंत बाद किया जाने वाला एक अत्यंत महत्वपूर्ण संस्कार है, जो नवजात शिशु के जीवन की पहली धार्मिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया मानी जाती है। यह संस्कार शिशु के जन्म के समय या उसके कुछ ही समय बाद संपन्न किया जाता है, जिसमें पिता या परिवार के ज्येष्ठ सदस्य द्वारा शिशु का स्वागत, आशीर्वाद और ईश्वर का स्मरण किया जाता है। वैदिक परंपरा के अनुसार इस संस्कार का उद्देश्य नवजात शिशु को आध्यात्मिक ऊर्जा, शुभ संस्कार और सकारात्मक जीवन की दिशा प्रदान करना है। इस प्रक्रिया में शिशु के कान में पवित्र मंत्र या “ॐ” का उच्चारण किया जाता है, जिससे उसके जीवन में ज्ञान, चेतना और धर्म का संचार हो। कुछ परंपराओं में शहद और घी का स्पर्श शिशु की जिह्वा पर कराया जाता है, जो मधुर वाणी और स्वास्थ्य का प्रतीक माना जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से जन्म के समय ग्रहों की स्थिति का अवलोकन भी इसी समय प्रारंभ होता है, जिससे आगे चलकर शिशु की जन्मकुंडली बनाई जाती है। जातकर्म संस्कार केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नवजीवन के स्वागत का एक पवित्र क्षण है, जिसमें परिवार शिशु के उज्ज्वल भविष्य, स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना करता है। यह संस्कार माता-पिता को भी यह स्मरण कराता है कि वे शिशु के पालन-पोषण में संस्कार, प्रेम और नैतिक मूल्यों का विशेष ध्यान रखें। इस प्रकार जातकर्म संस्कार जीवन के आरंभ में ही सकारात्मक ऊर्जा, आध्यात्मिकता और शुभता के बीजारोपण का प्रतीक माना जाता है, जो व्यक्ति के संपूर्ण जीवन को दिशा देने में सहायक होता है।