अंगारक दोष
वैदिक ज्योतिष में अंगारक दोष एक प्रभावशाली ग्रहयोग माना जाता है, जो तब बनता है जब मंगल (अंगारक) की युति राहु या केतु के साथ होती है, विशेष रूप से राहु के साथ इसकी युति को अधिक तीव्र माना जाता है। मंगल ऊर्जा, साहस, क्रोध और अग्नि तत्व का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि राहु भ्रम, असामान्य प्रवृत्ति, आवेग और अनियंत्रित इच्छाओं का कारक है। जब ये दोनों ग्रह एक साथ आते हैं, तो उनकी संयुक्त ऊर्जा अत्यधिक उग्र और असंतुलित हो सकती है, जिससे व्यक्ति के स्वभाव में आवेग, अधीरता, क्रोध और जल्दबाज़ी के निर्णय लेने की प्रवृत्ति बढ़ सकती है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति को विवाद, दुर्घटना, चोट, कानूनी उलझनों या संबंधों में तनाव का सामना करना पड़ सकता है। यह योग विशेष रूप से उन भावों में अधिक प्रभावी होता है जो स्वभाव, विवाह, धन या करियर से जुड़े हों। हालांकि यह दोष केवल नकारात्मक ही नहीं है, क्योंकि यदि मंगल मजबूत स्थिति में हो और शुभ ग्रहों का प्रभाव प्राप्त हो, तो यही योग व्यक्ति को अत्यधिक साहसी, निर्भीक, नेतृत्वक्षम और जोखिम लेने में सक्षम बना सकता है। ऐसे व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी हार नहीं मानते और अपनी ऊर्जा से बड़ी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकते हैं। इस दोष के निवारण के लिए मंगलवार का व्रत, हनुमान जी की उपासना, “ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः” मंत्र का जप, तथा लाल वस्तुओं का दान लाभकारी माना जाता है। इस प्रकार अंगारक दोष को केवल भय का कारण न मानकर, अपनी ऊर्जा को नियंत्रित और सकारात्मक दिशा में उपयोग करने का एक संकेत समझना चाहिए।
