दरिद्र दोष
वैदिक ज्योतिष में दरिद्र दोष उस स्थिति को कहा जाता है जब जन्मकुंडली में धन, आय और समृद्धि से जुड़े भाव (विशेषतः द्वितीय, एकादश और नवम) तथा उनके स्वामी ग्रह अशुभ प्रभाव में आ जाते हैं या पाप ग्रहों से पीड़ित होते हैं। द्वितीय भाव संचयित धन का, एकादश भाव आय और लाभ का तथा नवम भाव भाग्य का प्रतिनिधित्व करता है। जब इन भावों पर शनि, राहु, केतु या अशुभ मंगल का प्रभाव अधिक होता है, या इनके स्वामी ग्रह निर्बल, नीच राशि में या शत्रु राशि में स्थित होते हैं, तब व्यक्ति को आर्थिक अस्थिरता, धन की कमी, बार-बार हानि या आय में बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। इसे दरिद्र दोष कहा जाता है। इस दोष के कारण व्यक्ति को मेहनत के बावजूद अपेक्षित आर्थिक सफलता नहीं मिलती, या धन टिक नहीं पाता। कई बार अचानक खर्च, कर्ज या वित्तीय संकट की स्थिति भी बन सकती है। हालांकि यह समझना आवश्यक है कि यह दोष स्थायी नहीं होता, क्योंकि यदि कुंडली में गुरु, शुक्र या अन्य शुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो इसके परिणाम कम हो सकते हैं। साथ ही, दशा और गोचर के अनुसार आर्थिक स्थिति में सुधार भी संभव होता है। इसके निवारण के लिए दान-पुण्य, लक्ष्मी पूजन, शुक्रवार का व्रत, “ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै नमः” मंत्र का जप, तथा जरूरतमंदों की सहायता करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। इस प्रकार दरिद्र दोष को केवल गरीबी का संकेत न मानकर, जीवन में अनुशासन, परिश्रम और सकारात्मक कर्मों के माध्यम से आर्थिक संतुलन प्राप्त करने का एक अवसर समझना चाहिए।
