विष दोष
वैदिक ज्योतिष में विष दोष एक विशेष अशुभ योग माना जाता है, जो प्रायः चंद्रमा के साथ शनि या राहु के गहरे संबंध (युति या तीव्र दृष्टि) से बनता है। चंद्रमा मन, भावनाएँ, संवेदनशीलता और मानसिक संतुलन का कारक है, जबकि शनि दुःख, विलंब, एकाकीपन और कर्मफल का प्रतिनिधित्व करता है तथा राहु भ्रम, अस्थिरता और मानसिक उलझनों का संकेत देता है। जब ये ग्रह चंद्रमा को प्रभावित करते हैं, तो व्यक्ति के मानसिक और भावनात्मक जीवन में असंतुलन उत्पन्न हो सकता है, जिसे विष दोष कहा जाता है। इस दोष के प्रभाव से व्यक्ति को अत्यधिक चिंता, नकारात्मक विचार, भय, अवसाद या आत्मविश्वास की कमी का अनुभव हो सकता है। कई बार यह संबंधों में दूरी, पारिवारिक तनाव या निर्णय लेने में असमंजस के रूप में भी प्रकट होता है। हालांकि यह दोष केवल नकारात्मक ही नहीं है, क्योंकि यह व्यक्ति को गहराई से सोचने, आत्मविश्लेषण करने और जीवन के प्रति संवेदनशील दृष्टिकोण विकसित करने की क्षमता भी देता है। यदि कुंडली में गुरु या अन्य शुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो इसके दुष्प्रभाव काफी हद तक कम हो सकते हैं। इसके निवारण के लिए चंद्रमा को सशक्त करने के उपाय जैसे सोमवार का व्रत, भगवान शिव की उपासना, “ॐ नमः शिवाय” या “ॐ सोमाय नमः” मंत्र का जप, तथा दूध, चावल और सफेद वस्त्र का दान करना लाभकारी माना जाता है। साथ ही ध्यान, योग और सकारात्मक संगति से मानसिक संतुलन बनाए रखना भी अत्यंत आवश्यक है। इस प्रकार विष दोष को भय का कारण न मानकर आत्मनियंत्रण और मानसिक सुदृढ़ता विकसित करने का एक संकेत समझना चाहिए।
