पितृ दोष
वैदिक ज्योतिष में पितृ दोष एक महत्वपूर्ण कर्मजन्य योग माना जाता है, जो पूर्वजों (पितरों) के अपूर्ण कार्यों, अधूरे संस्कारों या उनके प्रति कर्तव्यों की उपेक्षा के कारण उत्पन्न होता है। जब जन्मकुंडली में सूर्य, चंद्रमा, राहु, केतु या शनि का विशेष अशुभ संयोजन नवम भाव (पितृ भाव), पंचम भाव (पूर्व जन्म के कर्म) या द्वितीय भाव (वंश) से जुड़ता है, तब पितृ दोष का संकेत मिलता है। विशेष रूप से सूर्य पर राहु या केतु की युति अथवा ग्रहण योग, या नवम भाव में पाप ग्रहों की स्थिति इस दोष को प्रबल बनाती है। इसका प्रभाव व्यक्ति के जीवन में बाधाओं, कार्यों में विलंब, आर्थिक अस्थिरता, संतान सुख में कमी, मानसिक अशांति या बार-बार असफलताओं के रूप में दिखाई दे सकता है। पितृ दोष का अर्थ यह नहीं कि व्यक्ति दोषी है, बल्कि यह संकेत है कि पूर्वजों की आत्माओं की शांति हेतु कुछ कर्म या श्रद्धा अपेक्षित है। विशेषकर पितृपक्ष के समय पितृ दोष के निवारण के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन, दान-पुण्य और पितरों का स्मरण अत्यंत प्रभावी उपाय माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त पीपल वृक्ष की सेवा, गाय को भोजन कराना और गंगा स्नान भी शुभ माना जाता है।
