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नक्षत्र पूजा “गंडमूल”

वैदिक ज्योतिष में गंडमूल नक्षत्र पूजा एक विशेष शांति अनुष्ठान है, जो तब किया जाता है जब शिशु का जन्म गंडमूल नक्षत्रों—अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती—में होता है। ये नक्षत्र राशियों के संधिकाल पर स्थित होते हैं, इसलिए इन्हें संवेदनशील माना गया है। परंपरागत मान्यता के अनुसार इन नक्षत्रों में जन्म लेने पर प्रारंभिक जीवन में कुछ बाधाएँ, पारिवारिक उतार-चढ़ाव या माता-पिता के लिए कष्ट की संभावना मानी जाती है, इसलिए इन प्रभावों को संतुलित करने के लिए गंडमूल शांति पूजा की जाती है। यह पूजा सामान्यतः जन्म के 27वें दिन, अर्थात् जब वही नक्षत्र पुनः आता है, तब विधिपूर्वक संपन्न की जाती है। इस अनुष्ठान में संबंधित नक्षत्र के देवता, नवग्रह और विशेष रूप से भगवान शिव की पूजा, हवन, मंत्रोच्चारण और दान-पुण्य किया जाता है, जिससे संभावित दोषों का निवारण हो सके और शिशु के जीवन में शुभता और संतुलन स्थापित हो। ज्योतिषीय दृष्टि से यह पूजा न केवल दोष शांति के लिए, बल्कि शिशु के स्वास्थ्य, दीर्घायु और समग्र विकास के लिए भी लाभकारी मानी जाती है। यह भी समझना आवश्यक है कि गंडमूल नक्षत्र केवल दोष का संकेत नहीं, बल्कि उनमें विशेष गुण और क्षमता भी होती है—जैसे नेतृत्व, शोध प्रवृत्ति, गहराई और संवेदनशीलता। इस प्रकार गंडमूल नक्षत्र पूजा का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि शिशु के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, सुरक्षा और संतुलन स्थापित करना है, ताकि वह अपने गुणों के साथ आगे बढ़कर सफल और सुखी जीवन जी सके।