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मुंडन

मुंडन संस्कार, जिसे चूड़ाकर्म भी कहा जाता है, हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में एक महत्वपूर्ण संस्कार है, जिसमें शिशु के जन्म के बाद पहली बार उसके बालों का पूर्णतः मुण्डन किया जाता है। यह संस्कार सामान्यतः शिशु के प्रथम, तृतीय या पाँचवें वर्ष में किया जाता है, हालांकि कुछ परंपराओं में इसे पहले वर्ष में भी सम्पन्न किया जाता है। ज्योतिषीय दृष्टि से मुंडन के लिए शुभ मुहूर्त का चयन अत्यंत आवश्यक माना जाता है, ताकि यह संस्कार शिशु के स्वास्थ्य, बुद्धि और आयु के लिए लाभकारी सिद्ध हो। मुहूर्त निर्धारण में तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण का विशेष ध्यान रखा जाता है। रोहिणी, मृगशिरा, पुष्य, हस्त, चित्रा, स्वाति और अनुराधा जैसे शुभ नक्षत्र इस संस्कार के लिए अनुकूल माने जाते हैं, जबकि अमावस्या, ग्रहण काल, भद्रा और अशुभ योगों से बचने की सलाह दी जाती है। चंद्रमा की शुभ स्थिति और शिशु की जन्मकुंडली का भी ध्यान रखा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार मुंडन से शिशु के जन्म से जुड़े अशुद्ध बाल हट जाते हैं और उसके शरीर व मन की शुद्धि होती है। आयुर्वेदिक दृष्टि से यह संस्कार बालों की बेहतर वृद्धि, मस्तिष्क के विकास और स्वास्थ्य को भी प्रोत्साहित करता है। इस अवसर पर पूजा, मंत्रोच्चारण और आशीर्वाद के साथ यह प्रक्रिया सम्पन्न की जाती है। इस प्रकार मुंडन मुहूर्त केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि शिशु के जीवन में शुद्धता, स्वास्थ्य और सकारात्मक ऊर्जा के आरंभ का प्रतीक माना जाता है।