सदगुरु, गुरु, ज्योतिषाचार्य, आचार्य, पुरोहित, पण्डित और ब्राह्मण

सदगुरु (महापुरुष)

यदि कोई भी व्यक्ति बालक ह्रदय से; शान्ति को अपने जीवन में साक्षात रूप में लाने की ईच्छा प्रगट करे तो समय के सदगुरु उस व्यक्ति का मार्गदर्शन कर, उसे ब्रह्म ज्ञान देते हैं और वह व्यक्ति उस ब्रह्म ज्ञान को प्राप्त कर; प्रतिदिन अभ्यासोप्रान्त यदि शान्ति और आनन्द का अनुभव करता है तो वह ज्ञानदाता ही समय के सदगुरु या महापुरुष कहे जाते हैं| ज्ञान की यात्रा वास्तव में स्वयं को खोजने की यात्रा है| ज्ञान लोगों के जीवन में उस आनंद को संभव बनाता है जो परिस्थियों के प्रभाव से स्वतंत्र है| ये एक विधि होती है जिसके द्वारा आप उसका अनुभव कर सकते हैं जो आपके अन्दर है| ज्ञान समस्याओं को ख़त्म नहीं करता है|  ये व्यक्ति को शान्ति का अनुभव करने में समर्थ बनाता है जो उसके अन्दर मौजूद है|  ज्ञान न तो कोई शारीरिक अथवा मानसिक समस्याओं से निदान पाने के लिए होता है और न ही ये कोई चिकित्सा का माध्यम है|  यह ब्रह्म ज्ञान जात-पात, लिंग, आर्थिक, सामाजिक स्थिति, धर्म, और रहन-सहन और रंगभेद से ऊपर उठकर संसार के सभी मानव मात्र के लिए संभव होता है|

गुरु

इस संसार में जब हम पहली स्वांस लेते हैं तो हमें नहीं पता कि गुरु शब्द क्या है, गुरु किसे कहते हैं और गुरु कौन है? धीरे-धीरे जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है तो माँ-बाप बताने लगते हैं कि कौन माँ है, कौन पिता है और कौन भाई-बहिन हैं, तब हमें कुछ समय बाद यह ज्ञान हो जाता है कि कौन-कौन है| मतलब प्रत्येक मनुष्य का पहले गुरु उसके माता-पिता होते हैं| उसके बाद जब व्यक्ति स्कूल, काँलेज आदि जाता है तो वहां  विभिन्न विषयों के को पढ़ाने वाले अलग-अलग अध्यापक होते हैं, उन्हें भी गुरु कहा जाता है| इस तरह जीवन में हमें जरुरत के मुताबिक जो भी किताबी ज्ञान देता है वह सब गुरु कहलाते हैं|

 ज्योतिषाचार्य

दिन, समय और स्थान के अनुसार ग्रहों, नक्षत्रों आदि की स्थिति की जानकारी और आकाशीय तथा पृथ्वी की घटनाओं के बीच संबंध का गणितीय गूढ़ ज्ञान जिस व्यक्ति को हो उसे ज्योतिषाचार्य या ज्योतिषविद कहा जाता है| इस ज्ञान के साथ यदि उस ज्योतिषी को ब्रह्मज्ञान भी प्राप्त हो तो उसके द्वारा दिए गए सुझाव/सलाह पर अवश्यमेव चार-चाँद लग जाते हैं, बशर्ते वह ज्योतिषाचार्य भी प्रतिदिन उस ब्रह्मज्ञान का अभ्यास करता हो, यह मेरा अनुभव है| ज्योतिष के माध्यम से हम धन बहुत कमा सकते हैं पर शान्ति और आनन्द नहीं, यह तो ब्रह्मज्ञान से ही संभव है| अत: ज्योतिषाचार्य वह व्यक्ति है जो किसी भी मनुष्य की जन्म कुंडली का अध्ययन कर उसके ग्रहों के आधार पर उसे समुचित सही दिशा और दशा का सुझाव देते हैं|

आचार्य

आचार्य उसे कहते हैं जिसे वेदों और शास्त्रों का ज्ञान हो और जो गुरुकुल में विद्यार्थियों को शिक्षा देने का कार्य करता हो। आचार्य का अर्थ यह कि जो आचार, नियमों और सिद्धातों आदि का अच्छा ज्ञाता हो और अन्य सभी को शुद्ध ज्ञान की शिक्षा देता हो। वह व्यक्ति जो कर्मकाण्ड का अच्छा ज्ञाता हो और यज्ञों आदि में मुख्य पुरोहित का काम करता हो उसे आचार्य कहा जाता था। आजकल आचार्य किसी महाविद्यालय के प्रधान अधिकारी और अध्यापक को भी कहा जाता है।

पुरोहित

पुरोहित दो शब्दों से बना है ‘पर’ तथा ‘हित’, अर्थात ऐसा व्यक्ति जो दूसरों के कल्याण की चिंता करता हो। प्राचीन काल में आश्रम के प्रमुख व्यक्ति को पुरोहित कहते थे, जहां शिक्षा दी जाती थी। वैसे यज्ञ कर्म करने वाले मुख्य व्यक्ति को भी पुरोहित कहा जाता था। यह पुरोहित सभी प्रकार के संस्कार कराने के लिए भी नियुक्त होता है। प्रचीनकाल में किसी राजघराने से भी पुरोहित संबंधित होते थे अर्थात राज दरबार में पुरोहित नियुक्त होते थे, जो धर्म-कर्म कार्य के सलाहकार समीति में सम्मिलित रहते थे।

पुजारी

पूजा और पाठ से संबंधित इस शब्द का अर्थ स्वयं ही प्रदर्शित होता है। जो व्यक्ति मंदिर या अन्य किसी स्थान पर पूजा पाठ करता हो वह पुजारी होता है। किसी देवी-देवता की मूर्ति या प्रतिमा की पूजा करने वाले व्यक्ति को पुजारी कहा जाता है।

पण्डित

पण्डित नाम का अर्थ विद्वता होता है। किसी विशेष ज्ञान में पारंगत होने वाले को ही पंडित कहते हैं। पण्डित का अर्थ होता है किसी ज्ञान विशेष में दक्ष या कुशल। पण्डित को विद्वान या निपुण भी कह सकते हैं। किसी विशेष विद्या का ज्ञान रखने वाला व्यक्ति ही पण्डित होता है। प्राचीन भारत में, वेद शास्त्रों आदि के बहुत बड़े ज्ञाता को पण्डित कहा जाता था। इस पण्डित को ही पाण्डेय या पाण्डे आदि कह कर पुकारते हैं। आजकल यह नाम ब्रह्मणों का उपनाम भी बन गया है। कश्मीर के ब्राह्मणों को तो कश्मीरी पंडितों के नाम से ही जाना जाता है। पण्डित की पत्नी को देशी भाषा में पण्डिताइन कहने का प्रचलन भी है।

ब्राह्मण

जो समस्त दोषों से रहित, अद्वितीय, आत्मतत्व से संपृक्त हों, वह ब्राह्मण होते हैं ! चूँकि आत्मतत्व सत्, चित्त, आनंद रूप ब्रह्म भाव से युक्त होता है, इसलिए इस ब्रह्म भाव से संपन्न मनुष्य को ही (सच्चा) ब्राह्मण कहा जा सकता है! संसार में वह सभी मनुष्य भी ब्राह्मण हैं जिनको ब्रह्म ज्ञान मिला हो और वह अपने सदगुरु के आज्ञानुसार ज्ञान-अभ्यास कर शान्ति के साथ जीवन का आनंद ले रहे हों|

जो पुरोहिताई कर अपनी जीविका चलाता है, वह ब्राह्मण नहीं, याचक है। पण्डित वह व्यक्ति है जो किसी विषय का विशेषज्ञ हो और जो कथा बांचता है वह ब्राह्मण नहीं कथावाचक है। जो ज्योतिष में पारंगत हो वह ब्राह्मण नहीं, वह ज्योतिषी होता है। इसी तरह जिसे सदगुरु द्वारा प्रदत्त ब्रम्ह ज्ञान मिला हो वही ब्राह्मण कहलाने योग्य है| अत: यदि ब्राह्मण व्यक्ति को ज्योतिष का ज्ञान भी हो तो निश्चय ही वह प्रत्येक मानवमात्र से अपनी सुझाव/सलाह का कम से कम  शुल्क लेगा| आज तक लोग सबको ही पण्डित जी या गुरु जी कह कर ही पुकारते या जानते थे| आज आपको मैंने अपने अनुभव के आधार पर सदगुरु, गुरु, ज्योतिषाचार्य, आचार्य, पुरोहित, पण्डित और ब्राह्मण में अंतर बताने की कोशिश की है|      

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