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पंचपातक का ज्योतिषीय विवेचन

(साहित्यिक सचेतना – नवम्बर 2025 अंक)

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार, पंचपातक (नशा, म्लेक्षता, मांसाहार, मुफ्तखोरी और कुसंग) मानव-चेतना को आच्छादित करने वाले पाँच अधर्म हैं, जो ग्रहों की अशुभ स्थितियों से उत्पन्न होकर विवेक और संस्कार का नाश करते हैं। ये दोष विशेषतः शनि, राहु, केतु, मंगल तथा चंद्र–शुक्र के विकृत योगों से निर्मित होते हैं, जब ये द्वितीय, सप्तम, अष्टम, दशम अथवा द्वादश भावों में सक्रिय रहते हैं। परिणामस्वरूप व्यक्ति के भीतर आत्मविरोध, असंयम और धर्मविचलन की प्रवृत्ति जन्म लेती है। पाप जहाँ किसी विशेष कर्म का असंतुलन है, वहीं पातक आत्मा के संस्कारों का विकार है। यह शुद्ध चेतना पर पड़ा तमोगुणी आवरण है, जो मनुष्य को भीतर से अधर्म की ओर खींचता है।

वेद और स्मृतियों के अनुसार, पातक आत्मशुद्धि के मार्ग का सबसे बड़ा अवरोध है। मनु, याज्ञवल्क्य और विष्णु स्मृति में इसका स्पष्ट उल्लेख है कि जब मानव का चित्त नशा, हिंसा, प्रमाद या दुष्संग से विकृत होता है, तब उसकी आत्मा का तेज मंद पड़ जाता है। वैदिक दृष्टि में आत्मा की प्रवृत्ति सत्य, संयम और सत्त्व में स्थिर है; जब यह प्रवृत्ति मोह, भोग, आलस्य या कुसंग में परिवर्तित हो जाती है, तब पंचपातक का उद्भव होता है। अतः पाप कर्मगत दोष है, जो प्रायश्चित्त से शुद्ध हो सकता है, पर पातक संस्कारगत विकृति है, जिसे केवल यज्ञ, स्वाध्याय और साधना के माध्यम से ही परिष्कृत किया जा सकता है।

नवग्रह इस अधर्म–धर्म संतुलन के नियामक हैं। सूर्य, चंद्र, बृहस्पति जैसे धर्मग्रह जब कमजोर हो जाएँ और शनि, राहु, केतु, मंगल जैसे अधर्मग्रह प्रभावी हों, तो व्यक्ति के भीतर धर्मबुद्धि का ह्रास और वासनाओं का प्रबल होना निश्चित है। जब राहु चंद्र पर, शनि शुक्र पर, मंगल बुध पर या केतु बृहस्पति पर प्रभाव डालते हैं, तब विवेक का क्षय और दुर्नीति का उदय होता है। यही स्थिति पातक-दोष का कारण बनती है। कुंडली में यदि लग्नेश या चंद्र पापग्रहों से पीड़ित हों, बृहस्पति नीच या अस्त हो या पंचमेश–नवमेश राहु–केतु के प्रभाव में हों, तो जातक को आत्मबोध और यज्ञोपाय की दिशा में अग्रसर होना चाहिए क्योंकि ज्योतिष केवल भविष्यफल नहीं बताता, वह आत्मशुद्धि और धर्म-पुनर्स्थापना का विज्ञान भी है।

प्रथम पातक— नशा : चेतना का आवरण
(१) नशा का तात्त्विक अर्थ — मन की माया में मोह
वेदान्त दृष्टि से नशा केवल मादक पदार्थ का सेवन नहीं, बल्कि चेतना पर छाया हुआ मोह का आवरण है। यह वह अवस्था है जब मन अपने ही मायाजाल में उलझ जाता है और वास्तविकता से दूर होकर सुख की कृत्रिम अनुभूति में डूब जाता है। “नशा” शब्द संस्कृत धातु “नश्” से बना है, जिसका अर्थ है — नष्ट होना, अर्थात् विवेक और स्मृति का लोप। इस प्रकार, नशा मन की माया में खोया हुआ वह भ्रम है , जो आत्मा को उसकी ज्योति से वंचित कर देता है। यह केवल शराब या मादकता तक सीमित नहीं, बल्कि सत्ता, काम, लोभ, क्रोध और अहंकार का नशा भी चेतना को आच्छादित करता है।

(२) चन्द्र, शुक्र और राहु का संयोजन : मादकता का योग
ज्योतिषीय दृष्टि से नशे का गहरा संबंध चन्द्र, शुक्र और राहु के संयोजन से है। चन्द्र मन का, शुक्र भोग का और राहु भ्रम का प्रतीक है। जब ये तीनों किसी कुंडली में एक साथ होते हैं या परस्पर दृष्टि करते हैं, तब व्यक्ति की मनोवृत्ति में मादकता, आसक्ति और आकर्षण की तीव्रता बढ़ जाती है। यह योग मनुष्य को बाह्य सुखों की खोज में भीतर की शांति से विमुख कर देता है। ऐसा जातक प्रायः कला, सौंदर्य या विलास में प्रवीण होता है, परंतु भीतर से अस्थिर और असंतुलित रहता है। यदि इस योग पर बृहस्पति या सूर्य की दृष्टि न हो, तो विवेक का प्रकाश मंद पड़ जाता है और व्यक्ति निर्णयशक्ति खो देता है।

(३) पंचम, सप्तम और द्वादश भाव में चन्द्र–शुक्र–राहु की स्थिति
कुंडली के पंचम, सप्तम और द्वादश भाव क्रमशः संस्कार, संबंध और वासनाओं से जुड़े हैं। जब इन भावों में चन्द्र–शुक्र–राहु की उपस्थिति या दृष्टि हो, तो नशा केवल पदार्थ तक सीमित नहीं रहता; वह संस्कारों, संबंधों और स्वप्नों तक फैल जाता है। पंचम भाव में यह संयोजन कल्पना और भावनात्मक व्यसन उत्पन्न करता है; सप्तम में यह कामविकार और संबंधों में असंतुलन लाता है; द्वादश में यह आत्मविस्मृति और पलायन की प्रवृत्ति को जन्म देता है। इस स्थिति में व्यक्ति “माया-भोग” के नशे में इतना डूब जाता है कि आत्मबोध का मार्ग धुँधला हो जाता है।

(४) नशे से उत्पन्न मोहदोष और निर्णयभ्रांति
नशे की सबसे सूक्ष्म और गहन क्षति निर्णयभ्रांति है। जब मन नशे के प्रभाव में आता है, चाहे वह मद्य का हो या अहंकार का हो तो मोहदोष जन्म लेता है। मोहदोष वह मानसिक स्थिति है जिसमें व्यक्ति असत्य को सत्य मानने लगता है और आत्महित–अनहित का भेद नहीं कर पाता। ज्योतिषीय रूप से यह दोष तब प्रकट होता है , जब चन्द्र राहु या शुक्र के प्रभाव से पीड़ित हो तथा बुध (विवेक का ग्रह) नीच या पापदृष्ट हो। परिणामस्वरूप व्यक्ति का निर्णय झूठे सुखों और भ्रमों पर आधारित होने लगता है; यह पातक का द्वार है यानि आत्म-विस्मृति की पहली अवस्था है।

(५) सोम और सत्व की पुनर्स्थापना के ज्योतिषीय उपाय
नशे से मुक्ति का अर्थ केवल पदार्थ छोड़ना नहीं, बल्कि सोम — अर्थात् सत्वगुण की पुनर्स्थापना है। ज्योतिष के अनुसार चन्द्र और बृहस्पति को बलवान बनाना ही आत्मशुद्धि का प्रथम उपाय है। इसके लिए चन्द्र मन्त्र “ॐ सोमाय नमः” का जप, सोमवार का उपवास, रात्रि में दूध या जल का दान तथा रजस्वला और रोगियों की सेवा से मन का सौम्यता बढ़ती है। बृहस्पति के लिए पीला वस्त्र, हल्दी या चने की दाल का दान तथा “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मन्त्र का जप उपयुक्त है। साथ ही, संयमित जीवन, ध्यान, ब्रह्मचर्य और जलाभिषेक जैसे कर्म चन्द्र-तत्त्व को शुद्ध करते हैं। जब सोम पुनः प्रकट होता है, तब सत्व जाग्रत होता है और चेतना के आवरण अपने आप हट जाते हैं।

द्वितीय पातक — म्लेक्षता : संस्कार और भाषा का पतन
(१) म्लेक्षता का अर्थ — असंस्कारिता, अशुद्ध आचरण और अपवित्र वाणी
‘म्लेक्षता’ शब्द संस्कृत धातु “म्लेश्” से बना है, जिसका अर्थ मलिन होना या अपवित्र होना है। वैदिक संदर्भ में म्लेक्षता का आशय किसी जाति या प्रदेश से नहीं, बल्कि उस मानसिक अवस्था से है जिसमें व्यक्ति के विचार, वाणी और आचरण असंस्कारित हो जाते हैं। जब मनुष्य का भाषण कठोर, व्यवहार अहंकारी और जीवन अपवित्रता की ओर झुकता है, तब म्लेक्षता का आरंभ होता है। यह केवल सामाजिक दोष नहीं, बल्कि आत्मिक अवनति का संकेत है, जहाँ संस्कारों का स्थान स्वार्थ, संयम का स्थान विलास और भाषा का स्थान अशुद्ध अभिव्यक्ति ले लेती है। यही वह स्थिति है जिसमें संस्कृति की आत्मा और संस्कार धीरे-धीरे नष्ट होती जाती है।

(२) बुध–राहु–शनि संयोग से मानसिक विकृति और असंस्कारता
ज्योतिष में बुध को वाणी, तर्क और व्यवहार का ग्रह माना गया है। जब यह राहु (मोह) और शनि (कठोरता) के साथ युति या दृष्टि में आता है, तब व्यक्ति की वाणी में अशुद्धि और विचारों में भ्रम उत्पन्न होता है। यह योग मनोवृत्ति को विकृत करता है — भाषा अपमानजनक, सोच संकीर्ण और दृष्टिकोण नकारात्मक बन जाता है। राहु हमेशा बुध को छलपूर्ण और शनि उसे कटु बनाता है। इस प्रकार बुध–राहु–शनि का संयोग म्लेक्षता का ज्योतिषीय मूल है, जिसमें व्यक्ति विवेक से नहीं, बल्कि अविश्वास, उपहास और कुतर्क से संचालित होता है। यही योग यदि चंद्र या बृहस्पति को भी प्रभावित करे, तो म्लेक्षता केवल वाणी तक सीमित नहीं रहती तो वह जीवन-दर्शन तक फैल जाती है।

(३) द्वितीय (वाणी), तृतीय (संगति) एवं नवम (धर्म) भाव में दोषयोग
म्लेक्षता के प्रभाव को समझने के लिए कुंडली के तीन भाव विशेष रूप से देखे जाते हैं — द्वितीय, तृतीय और नवम भाव। द्वितीय भाव वाणी और पारिवारिक संस्कार का, तृतीय भाव संगति और संप्रेषण का तथा नवम भाव धर्म, गुरु और संस्कृति का प्रतीक है। यदि इन भावों में राहु, शनि या मंगल जैसे पापग्रह स्थित हों या दृष्टि डालें, तो व्यक्ति की वाणी कटु, संगति अपवित्र और धर्म के प्रति उदासीन हो जाती है। विशेष रूप से, जब द्वितीय भाव का स्वामी राहु से ग्रसित हो, तो व्यक्ति अशिष्ट भाषा का प्रयोग करता है; तृतीय भाव दूषित हो तो कुसंग में आकर्षित होता है और नवम भाव पीड़ित हो तो गुरु, धर्म और संस्कारों से विमुख हो जाता है। यही त्रिवेणी म्लेक्षता के पूर्ण दोष को जन्म देती है।

(४) म्लेक्षता के रूप : व्यवहार, वस्त्र, भोजन, भाषा और विचार
म्लेक्षता का प्रभाव केवल वाणी तक सीमित नहीं रहता, यह व्यक्ति के पूरे जीवन-रूप को प्रभावित करता है। व्यवहार में असंवेदनशीलता, वस्त्रों में अराजकता, भोजन में असंयम, भाषा में अशिष्टता और विचारों में असंतुलन ये सभी म्लेक्षता के रूप हैं। यह दोष धीरे-धीरे मनुष्य के सौंदर्य-बोध और नैतिकता दोनों को नष्ट कर देता है। एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति सभ्यता के बाहरी आवरण में रहते हुए भी भीतर से ‘असंस्कारित’ हो जाता है। अतः म्लेक्षता का अर्थ किसी विदेशीता से नहीं, बल्कि संस्कारहीनता से है यानि वह अवस्था जहाँ व्यक्ति अपने ही सांस्कृतिक मूल्यों को तिरस्कार की दृष्टि से देखने लगता है।

(५) नवम भाव की शुद्धि और संस्कार ग्रह (बृहस्पति) की बलवृद्धि
म्लेक्षता के निवारण का प्रमुख उपाय नवम भाव और बृहस्पति ग्रह की शुद्धि है। नवम भाव गुरु, धर्म, सत्य और संस्कृति का केन्द्र है; अतः इस भाव की शक्ति बढ़ाने के लिए व्यक्ति को सत्संग, गुरुसेवा और स्वाध्याय में संलग्न होना चाहिए। बृहस्पति संस्कार और ज्ञान का प्रतिनिधि है और उसकी बलवृद्धि के लिए गुरुवार का व्रत, पीले वस्त्र और चने की दाल का दान तथा “ॐ बृं बृहस्पतये नमः” मन्त्र का नियमित जप श्रेष्ठ माना गया है। इसके अतिरिक्त, वाणी को शुद्ध करने हेतु गायत्री मन्त्र का नित्य उच्चारण, माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान तथा संयमित भोजन-वाणी-विचार का पालन — ये सब मिलकर म्लेक्षता के संस्कार-दूषण को शुद्ध करते हैं। जब नवम भाव में पुनः धर्म का प्रकाश जागता है, तब संस्कार लौट आते हैं और संस्कृति पुनः जीवित हो उठती है।

तृतीय पातक — मांसाहार : करुणा और प्राणद्रोह का पातक
(१) मांसाहार का अर्थ — स्वाद के लिए प्राणहिंसा
वेद और उपनिषदों में मांसाहार को केवल भोजन का विषय नहीं, बल्कि प्राणद्रोह कहा गया है अर्थात्, किसी जीव के जीवन को अपनी स्वादेच्छा के लिए छीन लेना। “अहिंसा परमो धर्मः” का सिद्धांत इसीलिए जीवन का मूल धर्म माना गया है, क्योंकि सभी प्राणी एक ही प्राण-तत्त्व से उत्पन्न हैं। जब मनुष्य अपने सुख के लिए किसी जीव की हिंसा करता है, तो वह न केवल बाह्य कर्म में, बल्कि अंतःकरण में भी अधर्म करता है। मांसाहार की मूल प्रवृत्ति ‘स्वाद’ के आवरण में छिपा रजस और तमस है, यह स्वाद चेतना की संवेदना को कुंठित कर देता है। जहाँ करुणा लुप्त होती है, वहाँ आत्मशुद्धि असंभव है; इसीलिए मांसाहार पंचपातकों में तीसरा और अत्यंत घातक पातक माना गया है।

(२) मंगल, राहु और चन्द्र के विकृत योग : रक्त, हिंसा और स्वाद की आसक्ति
ज्योतिष के अनुसार मंगल रक्त, बल और क्रिया का ग्रह है; राहु माया और आसक्ति का, जबकि चन्द्र मन और स्वाद का। जब ये तीनों किसी कुंडली में विकृत संयोजन बनाते हैं। जैसे राहु-मंगल युति चंद्र पर दृष्टि करे या चंद्र – राहु के प्रभाव में पड़े तब व्यक्ति में हिंसा, उत्तेजना और स्वादासक्ति की वृत्ति बढ़ जाती है। यह योग रक्त और राग दोनों की विकृति उत्पन्न करता है। ऐसा जातक अक्सर भोजन में तीव्र, मांसयुक्त या उग्र स्वादों की ओर आकर्षित होता है और उसमें करुणा की कमी देखने को मिलती है। यदि बृहस्पति या चंद्र नीच हों, तो यह दोष और गहरा हो जाता है, क्योंकि धर्मबुद्धि और संवेदना दोनों दुर्बल पड़ जाती हैं। यही योग मांसाहार की मानसिक भूमि तैयार करता है जो स्वाद, संवेदना पर हावी हो जाता है।

(३) छठे, आठवें एवं बारहवें भाव से हिंसात्मक प्रवृत्ति का आकलन
कुंडली में हिंसात्मक प्रवृत्ति का आकलन मुख्यतः छठे, आठवें और बारहवें भाव से किया जाता है। छठा भाव शत्रुता, आठवाँ भाव मृत्यु और बारहवाँ भाव व्यसन तथा मोह का सूचक है। यदि इन भावों में मंगल, राहु या शनि स्थित हों या दृष्टि डालें, तो व्यक्ति में दमन, वर्चस्व और संवेदनहीनता की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। विशेषतः, जब छठे भाव में मंगल राहु से प्रभावित हो, तो व्यक्ति हिंसक कार्यों में सहजता महसूस करता है; आठवें भाव में यह संयोजन रक्तदोष और शारीरिक विकृति लाता है; और बारहवें भाव में यह भोग और मादकता की प्रवृत्ति को बढ़ाता है। इन भावों की अशुद्धि मांसाहार और हिंसा के संस्कारों को जन्म देती है, जो केवल कर्मगत नहीं, बल्कि संस्कारगत दोष बनकर जीवनभर प्रभाव डालते हैं।

(४) मांसाहार से ग्रह-शरीर पर प्रभाव : रक्तदोष, क्रोध, हिंसा
मांसाहार का सीधा प्रभाव मंगल तत्त्व पर पड़ता है, क्योंकि यह ग्रह शरीर के रक्त और क्रिया का नियंता है। जब मंगल रजस और तमस से आच्छादित होता है, तो उसका तेज क्रोध में बदल जाता है। राहु के प्रभाव से यह क्रोध विकृत होकर हिंसा का रूप लेता है। शरीर में यह विकृति रक्तदोष, उच्च रक्तचाप या आक्रामक स्वभाव के रूप में प्रकट होती है। चंद्र यदि दुर्बल हो, तो मानसिक संतुलन भी बिगड़ता है और व्यक्ति असंवेदनशील तथा आवेशी हो जाता है। ज्योतिषीय रूप से कहा गया है — *“मांससेवनं रक्तदूषणं च” * — अर्थात्, मांसाहार न केवल शरीर के रक्त को, बल्कि आत्मा के संस्कारों को भी दूषित करता है। यह धीरे-धीरे करुणा, संवेदना और क्षमाशीलता को क्षीण कर देता है, जिससे व्यक्ति की आत्मिक प्रगति रुक जाती है।

(५) सात्त्विक आहार, हवन और अहिंसा यज्ञ के ग्रह-संतुलन सूत्र
मांसाहार के पातक से मुक्त होने का प्रथम उपाय सात्त्विक आहार है अर्थात् ऐसा भोजन जो जीवन की रक्षा करे, न कि उसे छिने। फल, दुग्ध, अनाज और जल से उत्पन्न भोजन का सेवन चंद्र और मंगल दोनों को शुद्ध करता है। अग्निहोत्र और अहिंसा यज्ञ जैसे संस्कार मंगल के क्रोध को कर्मबल में रूपांतरित करते हैं। चंद्र की शुद्धि के लिए सोम मंत्र — “ॐ सोमाय नमः” तथा मंगल की शुद्धि के लिए “ॐ अंगारकाय नमः” का जप लाभदायक है। राहु की नकारात्मकता दूर करने हेतु काला तिल दान, दूध मिश्रित जल से स्नान तथा संध्या-वंदन अनिवार्य हैं। जब व्यक्ति अहिंसा और करुणा का पालन करता है, तब उसके भीतर प्राण की पवित्रता पुनः जागती है। यही ग्रह-संतुलन का सूत्र है, जहाँ भोजन साधना बन जाता है और करुणा धर्म का केंद्र।

चतुर्थ पातक — मुफ्तखोरी : श्रम और कर्म के प्रति द्रोह
. मुफ्तखोरी का तात्त्विक अर्थ — परिश्रम का त्याग, परनिर्भरता का मोह
मुफ्तखोरी केवल आर्थिक निर्भरता नहीं, बल्कि एक गहन मानसिक और आध्यात्मिक दुर्बलता है। इसका तात्त्विक अर्थ परिश्रम का त्याग और परनिर्भरता का मोह है। जब व्यक्ति स्वयं के श्रम से विमुख होकर दूसरों की कमाई या सुविधा पर जीवित रहने लगता है, तब वह आत्मबल खो देता है। यह वृत्ति धीरे-धीरे आलस्य, स्वार्थ और असंतोष को जन्म देती है। श्रम का त्याग करना वास्तव में कर्म के धर्म से विमुख होना है, यही मुफ्तखोरी का मूल पातक है।

२. शुक्र–शनि–राहु की त्रिकोणिक स्थिति और दैहिक भोग की प्रवृत्ति
ज्योतिषीय दृष्टि से शुक्र–शनि–राहु की त्रिकोणिक स्थिति मुफ्तखोरी की प्रवृत्ति को जन्म देती है। शुक्र भोग का, शनि श्रम का और राहु छल, भ्रम तथा मोह का सूचक है। जब ये तीन ग्रह आपस में संयोग या दृष्टि से संबंधित होते हैं, तब व्यक्ति कर्म से अधिक भोग में रुचि लेने लगता है। उसे प्राप्ति की चाह होती है, पर परिश्रम का भाव नहीं। यह योग आत्म-संयम को दुर्बल कर देता है, जिससे मनुष्य श्रम से विमुख होकर तात्कालिक सुख के मोह में पड़ जाता है।

३. दशम और एकादश भाव में कर्मविरोधी योग
दशम भाव कर्म, दायित्व और कार्यक्षमता का है, जबकि एकादश भाव लाभ और परिणाम का है। जब इन दोनों भावों पर राहु, केतु या शनि जैसे ग्रहों का अशुभ प्रभाव पड़ता है, तब व्यक्ति कर्म के प्रति उदासीन हो जाता है। उसे बिना प्रयास लाभ प्राप्त करने की इच्छा सताने लगती है। ऐसे योग व्यक्ति को कर्म के मार्ग से हटाकर भाग्य, अवसर या दूसरों की कृपा पर निर्भर बना देते हैं। कर्मविरोधी योग के कारण जातक की सामाजिक प्रतिष्ठा और आत्मगौरव दोनों ही क्षीण होते जाते हैं।

४. कर्मफल बाधा — श्रमहीन सुख का क्षय
जो व्यक्ति बिना श्रम फल चाहता है, उसका सुख स्थायी नहीं रह सकता। यह स्थिति “कर्मफल बाधा” कहलाती है। कर्म से विमुख होकर प्राप्त लाभ, धन या पद अंततः क्षणभंगुर सिद्ध होता है, क्योंकि वह धर्मसम्मत नहीं होता है। श्रमहीन सुख आत्मा में अशांति और अपराधबोध उत्पन्न करता है। ऐसा व्यक्ति समाज में सम्मान खो देता है और अंततः अपनी ही असफलता का कारण बनता है। श्रम का त्याग वास्तव में ब्रह्म के कर्मनियम के प्रति द्रोह है।

५. दशमेश की आराधना, सूर्योपासना और श्रम-यज्ञ की साधना
मुफ्तखोरी के पातक से मुक्ति हेतु ज्योतिषीय उपायों में दशमेश (कर्मेश) की आराधना, सूर्योपासना और श्रम-यज्ञ की साधना अत्यंत प्रभावी मानी गई है। सूर्य कर्म, तेज और आत्मबल का प्रतीक है; उसकी उपासना से आलस्य दूर होता है। श्रम-यज्ञ — अर्थात श्रम को पूजा के रूप में करना ही व्यक्ति को आत्मनिर्भर और पुरुषार्थवान बनाता है। जब कर्म पुनः धर्म का रूप लेता है, तब मुफ्तखोरी का दोष स्वयमेव समाप्त हो जाता है और जीवन में सच्ची संतुष्टि का उदय होता है।

पंचम पातक — कुसंग : विवेक का क्षय
१. कुसंग का अर्थ — अविवेकी संगति से चित्त का पतन
कुसंग वह मानसिक प्रदूषण है जो अविवेकी, अधार्मिक या नकारात्मक संगति से उत्पन्न होता है। संगति का प्रभाव सूक्ष्म होता है। यह धीरे-धीरे चित्त पर छा जाता है और व्यक्ति की विचारशक्ति को विकृत कर देता है। कुसंग से विवेक का क्षय होता है; मनुष्य सही और गलत का भेद खो बैठता है। यह पातक केवल बाह्य संगति तक सीमित नहीं, बल्कि पुस्तकों, विचारों, मनोरंजन और आहार तक फैला होता है। जिस प्रकार स्वच्छ जल गंदे पात्र में दूषित हो जाता है, वैसे ही सत्चित्त कुसंग में रहकर मलिन हो जाता है।

. तीसरे, सप्तम, एकादश भाव के दृष्टिकोण से संगति विश्लेषण
ज्योतिषीय दृष्टि से संगति का गहन संबंध तीसरे, सप्तम और एकादश भावों से है। तृतीय भाव साथी और विचार-संवाद का, सप्तम भाव संबंधों और सहभागिता का, जबकि एकादश भाव मित्रता और समाज का प्रतीक है। यदि इन भावों में राहु, केतु या शनि जैसे ग्रह स्थित हों अथवा शुभग्रहों से दृष्टिहीन हों, तो व्यक्ति गलत संगति की ओर प्रवृत्त होता है। ऐसी स्थिति में उसके निर्णय और कर्म दोनों प्रभावित होते हैं, जिससे जीवन की दिशा बदल जाती है।

. राहु, केतु, मंगल के संयोजन से विकृत संगति योग
जब राहु, केतु और मंगल एक साथ या परस्पर दृष्टि-संबंध में आते हैं, तब विकृत संगति का योग निर्मित होता है। मंगल आवेग का, राहु भ्रम का और केतु अस्थिरता का प्रतिनिधि है। इनका संयुक्त प्रभाव व्यक्ति को हिंसक, अहंकारी अथवा अत्यधिक भोगवादी बना देता है। ऐसा जातक प्रायः असंयमी मित्रों, दुष्ट विचारों या छलपूर्ण समूहों से आकर्षित होता है। यह संयोजन कुसंग के माध्यम से कर्म-विचलन और नैतिक पतन का कारण बनता है।

४. कुसंग से संस्कार-दूषण और निर्णय-विकृति
कुसंग केवल व्यवहार को नहीं, बल्कि संस्कारों की जड़ को भी प्रभावित करता है। यह मनुष्य की निर्णय-शक्ति, विवेक और आत्म-श्रद्धा को क्षीण कर देता है। धीरे-धीरे व्यक्ति अपने ही जीवन-मूल्यों से विमुख होकर बाह्य प्रभावों में उलझ जाता है। संस्कार-दूषण का यह चरण सबसे गहरा होता है, क्योंकि यह आत्मबोध को आच्छादित कर देता है। कुसंग का परिणाम यह होता है कि व्यक्ति धर्म, सत्य और साधना से दूर होकर अधर्म, भ्रम और असंतोष में जीने लगता है।

५. गुरु-दृष्टि की स्थापना, साधु-संग और नवमभाव की शुद्धि
कुसंग से मुक्ति का सर्वोत्तम उपाय गुरु-दृष्टि की स्थापना है। गुरु का अर्थ केवल व्यक्ति नहीं, बल्कि वह प्रकाश जो विवेक को जगाता है। साधु-संग अर्थात सत्संग, शास्त्र-श्रवण और शुभ-विचार ही चित्त को पुनः शुद्ध करता है। नवम भाव धर्म, गुरु और संस्कारों का भाव है; इसकी शुद्धि के लिए बृहस्पति की आराधना, गुरुवार का व्रत और दान-संयम का पालन शुभ माना गया है। जब मनुष्य विवेक की दृष्टि पुनः प्राप्त करता है, तब कुसंग का अंधकार स्वयं विलीन हो जाता है।

पंचपातक के संयुक्त योग और कर्मफल
१. जब एक से अधिक पातक योग मिलते हैं — सम्मिलित फल
कुंडली में यदि एक से अधिक पातक योग एक साथ विद्यमान हों, तो उनके सम्मिलित प्रभाव से जीवन में गहन असंतुलन उत्पन्न होता है। नशा, म्लेक्षता, मांसाहार, मुफ्तखोरी और कुसंग ये पाँचों जब परस्पर मिलते हैं, तो मनुष्य का चित्त धीरे-धीरे अधर्म की ओर झुकने लगता है। ऐसे जातक में आत्मसंयम, विवेक और कर्तव्यभाव क्षीण हो जाते हैं। पंचपातक का संयुक्त प्रभाव व्यक्ति के धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को बाधित करता है। यह सम्मिलित योग केवल जीवन में विघ्न नहीं लाता, बल्कि आत्मा की प्रगति को भी रोक देता है।

२. राहु और शनि के सहपातक योग
पंचपातक के संयुक्त योगों में राहु और शनि का संबंध विशेष रूप से घातक माना गया है। राहु भ्रम, माया और असत्य का प्रतीक है, जबकि शनि कर्म, दुःख और दंड का, जब दोनों मिलते हैं या परस्पर दृष्टि में होते हैं, तब “सहपातक योग” निर्मित होता है। यह योग व्यक्ति को कर्मविमुख, नकारात्मक और दुष्प्रवृत्तियों की ओर प्रेरित करता है। ऐसे योग में जातक बार-बार अपने कर्मों के परिणामस्वरूप मानसिक अशांति, सामाजिक असफलता और आत्मग्लानि का अनुभव करता है। यह संयोजन अक्सर जन्मों के संस्कारदूषण का द्योतक भी होता है।

३. अष्टम भाव में पंचपातक का केंद्र — संस्कार विनाश
अष्टम भाव को ज्योतिष में “संस्कारों और गूढ़ कर्मफल” का भाव कहा गया है। जब पंचपातक से संबंधित ग्रह — जैसे राहु, केतु, मंगल, शनि या चन्द्र इस भाव में स्थित हों, तो व्यक्ति के संस्कार और चरित्र दोनों प्रभावित होते हैं। यह स्थिति गुप्त दोष, असंयम और अनियंत्रित इच्छाओं का केंद्र बन जाती है। अष्टम भाव में पंचपातक का योग व्यक्ति को आत्मविरोधी बना देता है, जिससे उसका आचरण और विचार दोनों द्वंद्वपूर्ण हो जाते हैं। संस्कार-विनाश का यह चरण आत्मशुद्धि के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है।

४. जातक जीवन में पातक-दोष के परिणाम (सामाजिक, मानसिक, आध्यात्मिक)
पातक-दोष के प्रभाव केवल ग्रहों तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जातक के सामाजिक, मानसिक और आध्यात्मिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं। सामाजिक स्तर पर व्यक्ति का विश्वास और प्रतिष्ठा क्षीण होती है; मानसिक स्तर पर भय, असुरक्षा और असंतोष जन्म लेते हैं; और आध्यात्मिक स्तर पर साधना में स्थिरता समाप्त हो जाती है। पातक-दोष जातक के कर्मफल को विकृत कर देता है, जिससे वह अपने ही कर्मों के जाल में उलझ जाता है। अंततः जीवन में अवसाद, हानि और आत्मद्वेष की स्थिति उत्पन्न होती है।

५. साधना, यज्ञ और ग्रहशुद्धि के संयुक्त उपाय
पंचपातक के संयुक्त दोषों से मुक्ति के लिए साधना, यज्ञ और ग्रहशुद्धि ये तीनों उपाय आवश्यक हैं। साधना द्वारा मन और इंद्रियों पर नियंत्रण प्राप्त होता है, यज्ञ द्वारा वातावरण और कर्म की शुद्धि होती है और ग्रहशुद्धि द्वारा जन्मगत दोषों का निवारण। राहु और शनि के लिए शनि-जप, नीलम या गोमेद धारण से पहले योग्य आचार्य का परामर्श आवश्यक है। इसके साथ ही नवग्रह शांति यज्ञ, सूर्योपासना और गुरु-दर्शन के माध्यम से आत्मबल को पुनर्स्थापित किया जा सकता है। जब साधना और कर्म एक हो जाते हैं, तब पंचपातक का अंधकार नष्ट होकर आत्मा पुनः प्रकाशमय हो उठती है।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 110059

धीर का सोमपान — आत्मानंद का अमृत
 (भावपल्लवन)

(साहित्यिक सचेतना – नवम्बर 2025 अंक)

“न वृथा हि धीराः पिबन्ति सोमम्।” ऋग्वेद १०.८५.३
भावार्थ: धीर (विवेकी) पुरुष व्यर्थ में मादक द्रव्य का सेवन नहीं करते।

ऋग्वैदिक श्लोक “न वृथा हि धीराः पिबन्ति सोमम्” में प्रत्येक शब्द अपने आप में एक जीवन-दर्शन समेटे है। ‘धीराः’ वे हैं जो विवेकशील, संयमी और आत्मनियंत्रित होते हैं। ‘न वृथा’ का अर्थ है — वे व्यर्थ, निरुद्देश्य या अकारण किसी भी वस्तु का सेवन नहीं करते। ‘हि’ यहाँ सत्य और निश्चय का बोध कराता है — अर्थात यह कोई अनुमान नहीं, बल्कि स्थायी सत्य है। ‘पिबन्ति’ का अर्थ है — ग्रहण करना या आत्मसात करना और ‘सोमम्’ उस अमृतरस का प्रतीक है जो आनंद, चेतना और आत्मानुभूति से उत्पन्न होता है। इस प्रकार यह श्लोक कहता है कि सच्चा आनंद बाहरी पदार्थों से नहीं, भीतर के जागरण से आता है।

ऋग्वेद का यह मंत्र जीवन में संयम, विवेक और उद्देश्यपूर्ण कर्म की अनूठी शिक्षा देता है। यहाँ ‘धीर’ शब्द केवल शांतचित्त व्यक्ति के लिए नहीं, बल्कि उस साधक के लिए है जो अपनी बुद्धि को स्थिर रखकर सत्य का अनुभव करता है। वेद कहता है कि धीर पुरुष कभी व्यर्थ में किसी भी वस्तु,भोग या पदार्थ का उपयोग नहीं करते, क्योंकि उनके लिए जीवन का हर कर्म साधना का अंग होता है।

धीर व्यक्ति का जीवन लक्ष्यविहीन नहीं होता। वह जानता है कि जो कुछ उसे मिला है, वह ईश्वर की कृपा और अपनी साधना का परिणाम है। इसलिए वह उस कृपा का अपव्यय नहीं करता। “सोम” यहाँ केवल पेय नहीं, बल्कि आनंद और चेतना का प्रतीक है — वह अमृतरस जो तप, सत्य और सेवा से उपजता है। धीर उस सोम का पान करता है, जो भीतर से जागृत होता है, न कि बाहरी नशे से उत्पन्न होता है।

नशा किसी भी रूप में विवेक का शत्रु है। वह मनुष्य को अपने आत्मस्वरूप से दूर ले जाता है। धीर व्यक्ति भलीभाँति जानता है कि जब चेतना पर आवरण चढ़ जाता है, तब निर्णय शक्ति क्षीण हो जाती है। इसलिए वह नशे, आलस्य और असंयम के मार्ग से दूर रहता है। उसका आनंद शुद्ध आत्मिक होता है, जो क्षणिक नहीं, शाश्वत होता है।

सोम का प्रतीक वेदों में केवल यज्ञ का पेय नहीं, बल्कि ब्रह्मानंद का अनुभव है। जो साधक तप, अध्ययन और सत्कर्म के द्वारा भीतर के सोम को जाग्रत करता है, वही सच्चा “पिबन्ति सोमम्” — सोमपान करता है। परंतु वेद चेतावनी देता है कि यह पान वृथा न हो; अर्थात यह अनुभव केवल बाहरी कर्मकाण्ड के लिए न हो, बल्कि अंतर्यात्रा के लिए हो।

धीर वही है जो अपने कर्मों का उद्देश्य जानता है। वह जानता है कि प्रत्येक क्रिया का एक परिणाम है या तो वह उसे ऊर्ध्वगामी बनाती है या अधोगामी। इसीलिए वह विवेकपूर्वक ही जीवन का हर कदम उठाता है। उसका आनंद संयम में है, उसका उत्सव आत्मज्ञान में है।

जब मनुष्य विवेक खो देता है, तब आनंद की खोज उसे भोग और मादकता की ओर ले जाती है, किंतु वह सुख क्षणिक होता है और पश्चाताप की भूमि तैयार करता है। इसके विपरीत, धीर का आनंद स्थायी होता है क्योंकि वह ज्ञान और संतुलन में निहित है। वह जानता है कि सच्चा सोम भीतर के सत्य में है, बाहर के पात्र में नहीं होता है।

इस श्लोक में छिपा संदेश यह भी है कि विवेकी व्यक्ति अपने जीवन को यज्ञ बनाता है। वह जो भी करता है, उसे ईश्वर को समर्पित करता है। उसके लिए भोजन, निद्रा, कार्य और विश्राम सभी योग और अनुशासन का हिस्सा हैं। इसीलिए उसका प्रत्येक कर्म अर्थवान होता है।

धीर व्यक्ति अपने समाज और परिवेश के लिए भी अनुकरणीय होता है। वह दूसरों को भी संयम और विवेक की राह दिखाता है। उसका आचरण प्रेरणा बनता है, क्योंकि वह केवल उपदेश नहीं देता बल्कि वह अपने जीवन से उदाहरण प्रस्तुत करता है। यही कारण है कि ऐसे व्यक्ति के जीवन में नशा नहीं, केवल निर्मलता होती है।

वेद का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना सहस्राब्दियों पहले था। आज जब समाज मादकता और भोग की अंधी दौड़ में फँसता जा रहा है, तब “न वृथा हि धीराः पिबन्ति सोमम्” की वाणी हमें चेताती है कि संयम ही सच्चा आनंद है। बाहरी नशा विनाश लाता है, पर आत्मनशा — आत्मज्ञान — अमरत्व देता है।

अतः इस मंत्र का गूढ़ भाव यही है कि जीवन को व्यर्थ कर्मों में न गँवाया जाए। हर कर्म ज्ञान से प्रेरित हो, हर आनंद आत्मिक हो, और हर पान — चाहे वह शब्द का हो, कर्म का या विचार का हो, वह केवल सत्य के लिए ही हो। यही धीर का जीवन है, यही सोम का सही पान है।

इस श्लोक का सार यही है कि जो धीर है, वही सोम का सच्चा पान करता है। जो विवेक से जीता है, वही अमरत्व का रस प्राप्त करता है। पंचपातक आत्मा के आवरण हैं और धैर्य वह दीपक है जो इन अंधकारों को भेदता है। इसलिए यह श्लोक “न वृथा हि धीराः पिबन्ति सोमम्” आज भी उतना ही सत्य है, क्योंकि विवेक से पिया गया आनंद ही अमृत है और वही मुक्ति का मार्ग है।

धीर न पान करें व्यर्थ, सोम सुबुद्धि रस जानि।
आत्मानंद सुधा पियें, त्यागें मादक-पानि॥

विवेक जगे जिन चेत में, वही अमर रस पाय।
न वृथा हि धीराः पिबन्ति, वेद वचन फल छाय॥

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 110059

स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाओं का योगदान

(BFC पब्लिकेशन लखनऊ (उ०प्र०) के नवम्बर 2025 अंक में प्रकाशित)

प्रधान सम्पादक- डॉ सीताराम आठिया, पीएचडी, डी लिट (मानद)

भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल एक राजनीतिक क्रांति नहीं था, बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की संयुक्त प्रक्रिया थी। इस संघर्ष में भारतीय महिलाओं की भूमिका ने विशेष स्थान प्राप्त किया। उन्होंने न केवल अपने घर-परिवार की सीमाएँ लांघीं, बल्कि मातृभूमि के लिए अपने प्राणों की आहुति तक दी। विशेषकर उत्तर भारत की धरती — उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड — इस गौरवगाथा की साक्षी रही है। इन दोनों प्रदेशों की महिलाओं ने असाधारण साहस, त्याग और संगठन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम को जनांदोलन का स्वरूप प्रदान किया।

स्वाधीनता-पूर्व काल में भारत की सामाजिक संरचना गहरे पितृसत्तात्मक विचारों से प्रभावित थी। महिलाएँ पर्दा-प्रथा, अशिक्षा और रूढ़िगत परंपराओं से बंधी हुई थीं। फिर भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाओं में राष्ट्रप्रेम की चिंगारी धीरे-धीरे प्रज्वलित होने लगी। समाज-सुधार आंदोलनों, आर्य समाज और कांग्रेस के आरंभिक संगठनों ने इस चेतना को दिशा दी। शिक्षा संस्थाओं की स्थापना, महिला संघों का गठन और समाज में समान अधिकारों की माँग ने महिला जागरण की प्रक्रिया को तीव्र किया। यही प्रारंभिक चेतना आगे चलकर स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी का आधार बनी।

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में उत्तर प्रदेश की महिलाओं ने अद्वितीय साहस दिखाया। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई इस क्रांति की प्रतीक बन गईं। उन्होंने अपने वीरत्व, नेतृत्व और असीम त्याग से पूरे राष्ट्र को प्रेरित किया। रानी लक्ष्मीबाई का पराक्रम भारतीय नारी के आत्मविश्वास का परिचायक बना। इसी काल में अवध की बेगम हजरत महल ने भी अंग्रेजों के विरुद्ध लखनऊ में विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने न केवल सैन्य मोर्चे पर संघर्ष किया, बल्कि जनता के बीच स्वराज की भावना को भी सशक्त किया। इन वीरांगनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी केवल गृहस्थी तक सीमित नहीं, बल्कि राष्ट्र की स्वतंत्रता की प्रहरी भी हो सकती है।

1857 के बाद अंग्रेज़ी शासन ने विद्रोह को दबा दिया, किन्तु नारी चेतना की ज्वाला शांत नहीं हुई। उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों — फैजाबाद, लखनऊ, बनारस, इलाहाबाद, कानपुर, शाहजहाँपुर आदि में महिलाओं ने धीरे-धीरे राजनीतिक जागरूकता अर्जित की। उन्होंने स्थानीय सभाओं, प्रार्थना समितियों और स्वदेशी संस्थानों के माध्यम से आंदोलन की तैयारी की। इस समय के सामाजिक परिवेश में महिला शिक्षा और संगठन-निर्माण को प्राथमिकता दी गई। यही कारण था कि 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में जब महात्मा गांधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन आरंभ हुआ, तो उत्तर प्रदेश की महिलाएँ बड़ी संख्या में इसमें सम्मिलित हुईं।

महात्मा गांधी के विचारों ने भारतीय नारी को नई दिशा दी। उन्होंने सत्य, अहिंसा और स्वदेशी के माध्यम से जन-जन में आत्मविश्वास और आत्मबल जगाया। असहयोग आंदोलन के दौरान उत्तर प्रदेश की महिलाओं ने विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार किया, चरखा चलाना सीखा और अपने घरों में खादी के प्रचार का कार्य संभाला। कई महिलाएँ जेल गईं, कई ने अपने परिवारों की संपत्ति राष्ट्र को समर्पित कर दी। गांधीजी के आह्वान पर महिलाओं ने आंदोलन में केवल समर्थक की नहीं, बल्कि नेतृत्वकर्ता की भूमिका निभाई।

कस्तूरबा गांधी, कमला नेहरू, सरोजिनी नायडू और सुबद्रा कुमारी चौहान जैसी महिलाएँ इस काल की प्रेरणा बनीं। सरोजिनी नायडू, जो “भारत की कोकिला” के नाम से प्रसिद्ध थीं, ने उत्तर प्रदेश की जनता में राजनीतिक जागरूकता का संचार किया। वे कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं और उन्होंने लखनऊ, कानपुर, इलाहाबाद जैसे स्थानों पर महिला सभाओं को संबोधित किया। उनकी कविताएँ और भाषण दोनों ही राष्ट्रप्रेम की अग्नि से ओत-प्रोत थे। सुबद्रा कुमारी चौहान की कविता “झाँसी की रानी” ने तो पूरे देश में नारी-शौर्य की भावना जगा दी।

इसी काल में बनारस की दुर्गा भाभी ने क्रांतिकारी संगठन ‘हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के साथ मिलकर अंग्रेज़ी शासन के विरुद्ध कार्य किया। उन्होंने भगत सिंह और राजगुरु को बचाने के लिए अपने जीवन को संकट में डाल दिया। प्रयागराज की अरुणा आसफ अली ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान तिरंगा फहराकर इतिहास रचा। लखनऊ की बेगम रईसुन्निसा ने मुस्लिम महिलाओं को स्वराज आंदोलन से जोड़ा और समाज के भीतर धार्मिक एकता की भावना को बल दिया।

इनके साथ-साथ कमला नेहरू का योगदान भी अत्यंत उल्लेखनीय रहा। उन्होंने पति जवाहरलाल नेहरू के साथ कई बार जेल यात्राएँ कीं। उनका जीवन त्याग, सरलता और राष्ट्रप्रेम का प्रतीक था। उन्होंने प्रयागराज और लखनऊ की महिलाओं को आंदोलन से जोड़ा और स्वदेशी उत्पादों के प्रचार में अग्रणी भूमिका निभाई। कमला नेहरू के नेतृत्व में “महिला स्वराज्य समिति” का गठन किया गया जिसने स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं की भागीदारी को संगठित रूप दिया।

उत्तराखंड की पर्वतीय भूमि, जो अपने कठोर जीवन और श्रमशील समाज के लिए प्रसिद्ध है, वहाँ की महिलाओं ने भी स्वतंत्रता की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संचार के अभाव और भौगोलिक कठिनाइयों के बावजूद, उन्होंने राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। अल्मोड़ा, नैनीताल, पौड़ी और टिहरी जैसे क्षेत्रों में महिलाओं ने नमक सत्याग्रह, जंगल सत्याग्रह और विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलनों में हिस्सा लिया। गोविंद बल्लभ पंत और श्रीदेव सुमन जैसे नेताओं के साथ महिलाएँ भी सत्याग्रह पथ पर डटी रहीं। उन्होंने जेल यात्राएँ कीं, पुलिस अत्याचारों का सामना किया और अपने गांवों में स्वराज की भावना को प्रसारित किया।

कुमाऊँ और गढ़वाल क्षेत्रों में महिलाओं ने ब्रिटिश शासन के शोषण के विरुद्ध कई आंदोलनों को जन्म दिया। अल्मोड़ा की महिलाओं ने 1930 में नमक सत्याग्रह के दौरान स्थानीय नमक बनाकर स्वदेशी की मिसाल कायम की। श्रीदेव सुमन के नेतृत्व में टिहरी राज्य में महिलाओं ने सामंतवादी शासन और ब्रिटिश प्रभाव के विरोध में आवाज उठाई। इन आंदोलनों ने स्वतंत्रता-संग्राम के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन की दिशा भी प्रशस्त की।

शिक्षा और समाज-सुधार के क्षेत्र में भी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाओं ने अग्रणी भूमिका निभाई। प्रयागराज, वाराणसी और लखनऊ में महिला शिक्षालयों और सामाजिक संस्थाओं की स्थापना की गई। लखनऊ विश्वविद्यालय और काशी विद्यापीठ जैसे केंद्रों ने महिला शिक्षा के माध्यम से राष्ट्र-जागरण को दिशा दी। इस काल की महिलाएँ केवल आंदोलनकारिणी नहीं, बल्कि समाज की शिक्षिका और मार्गदर्शक भी बनीं।

स्वतंत्रता संग्राम में अनेक ऐसी महिलाएँ भी थीं जिनका नाम इतिहास में दर्ज नहीं हो सका, पर उनके योगदान ने आंदोलन को आधार दिया। देहरादून की कमला पंत, अल्मोड़ा की शारदा जोशी, प्रयागराज की विद्यावती देवी, गोरखपुर की लक्ष्मीशंकर मिश्र की पत्नी — इन सबने भूमिगत कार्यों में भाग लिया। उन्होंने अपने घरों को क्रांतिकारियों का आश्रय बनाया, संदेश पहुँचाए, धन और भोजन की व्यवस्था की और अनेक बार अंग्रेज़ी पुलिस के सामने दृढ़ता से खड़ी रहीं। उनका योगदान अमर है, यद्यपि वह दस्तावेजों में मौन है।

इन सभी घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाओं ने स्वतंत्रता संग्राम को न केवल बल दिया, बल्कि उसके नैतिक और सांस्कृतिक स्वरूप को भी आकार दिया। उन्होंने राष्ट्रवाद को भावनात्मक धरातल दिया — जहाँ प्रेम, करुणा और बलिदान का संगम था। इनकी भागीदारी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को आध्यात्मिक आयाम प्रदान किया।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इन महिलाओं की भूमिका समाप्त नहीं हुई। उन्होंने समाज-निर्माण, शिक्षा और महिला-सशक्तिकरण के कार्यों को आगे बढ़ाया। वे केवल स्वतंत्रता की वाहक नहीं रहीं, बल्कि स्वतंत्र भारत की निर्माता भी बनीं। आज जब हम नारी-समता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की बात करते हैं, तो यह स्मरण आवश्यक है कि इन मूल्यों की जड़ें स्वतंत्रता संग्राम की उस नारी-शक्ति में निहित हैं, जिसने त्याग, सेवा और सत्य के माध्यम से भारत की आत्मा को पुनर्जीवित किया।

अतः यह कहना सर्वथा उचित है कि स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की महिलाओं के योगदान के बिना अधूरा है। उन्होंने उस युग के अंधकार को अपने साहस की ज्योति से आलोकित किया। उनकी भूमिका केवल इतिहास नहीं, बल्कि वर्तमान पीढ़ी के लिए प्रेरणा-स्रोत है। उनका संघर्ष यह सिखाता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि आत्मा की मुक्ति का प्रतीक है और इस मुक्ति का सबसे उज्ज्वल रूप भारतीय नारी ने अपने त्याग और तपस्या से रचा।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 110059

स्वतंत्रता आंदोलन में कुयिली का योगदान

(BFC पब्लिकेशन लखनऊ (उ०प्र०) के नवम्बर 2025 अंक में प्रकाशित)

प्रधान सम्पादक- डॉ सीताराम आठिया, पीएचडी, डी लिट (मानद)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में असंख्य वीरांगनाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी, परंतु कुछ नाम ऐसे हैं जो इतिहास की मुख्य धारा से विलुप्त कर दिए गए, जबकि उनके त्याग और साहस ने आज़ादी के आंदोलन की नींव को गहराई प्रदान की। ऐसी ही एक वीरांगना कुयिली थीं, जो तमिलनाडु की धरती से निकलीं और जिन्होंने अपने प्राणों की बलि देकर देशभक्ति का वह उदाहरण प्रस्तुत किया जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है। कुयिली न केवल एक योद्धा थीं, बल्कि नारी-शक्ति, समर्पण और देशभक्ति का मूर्त रूप थीं। उनका योगदान दक्षिण भारत के स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक चरण का एक अमिट अध्याय है।

कुयिली का जन्म तमिलनाडु के शिवगंगा क्षेत्र में हुआ था। वे उस समय की प्रसिद्ध रानी वीरमंगई वेलुनाच्चियार की विश्वसनीय सेनानायिका और अंगरक्षक थीं। कुयिली का जीवन बचपन से ही साहस, निष्ठा और त्याग से ओतप्रोत था। वे एक सामान्य परिवार से थीं, लेकिन उनका हृदय असाधारण था। उस युग में जब महिलाएं युद्धक्षेत्र से दूर रखी जाती थीं, कुयिली ने समाज की परंपराओं को तोड़ते हुए स्वयं को एक योद्धा के रूप में स्थापित किया। रानी वेलुनाच्चियार की सेना में उनका स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण था। वे केवल एक अंगरक्षक नहीं, बल्कि रानी की आत्मा समान सहयोगिनी थीं।

अठारहवीं सदी का भारत अंग्रेजों की चालाकियों से ग्रस्त था। पल-पल स्वतंत्र राज्यों को ब्रिटिश सत्ता के अधीन लाने की साजिशें रची जा रही थीं। तमिलनाडु का शिवगंगा राज्य भी इससे अछूता नहीं था। जब अंग्रेजों ने इस राज्य पर आक्रमण किया, तब रानी वेलुनाच्चियार और उनकी सेना ने वीरता से मोर्चा संभाला। इस संघर्ष में कुयिली ने असाधारण पराक्रम का प्रदर्शन किया। उन्होंने न केवल युद्धनीति की समझ दिखाई, बल्कि व्यक्तिगत बलिदान का सर्वोच्च उदाहरण भी दिया। अंग्रेजों के विरुद्ध युद्ध में जब रानी की सेना चारों ओर से घिर गई, तब कुयिली ने अपने जीवन का सर्वोच्च निर्णय लिया — आत्माहुति।

कुयिली का वह निर्णय भारतीय इतिहास में दुर्लभ है। उन्होंने अपने शरीर पर तेल लगाकर स्वयं को दीपक की भांति प्रज्वलित किया और ब्रिटिश सेना के बारूदघर में कूद गईं। यह कोई क्षणिक आवेग नहीं था, बल्कि राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत एक सुनियोजित निर्णय था। उन्होंने जान लिया था कि उनके इस बलिदान से अंग्रेजों की युद्ध-सामग्री नष्ट हो जाएगी और रानी को पुनः शक्ति प्राप्त करने का अवसर मिलेगा। उनके इस अमर बलिदान ने स्वतंत्रता संग्राम की भावना को नई दिशा दी। यह घटना दर्शाती है कि कुयिली न केवल साहसी थीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अद्वितीय थीं।

कुयिली का योगदान केवल एक युद्ध तक सीमित नहीं है। उन्होंने ब्रिटिश शासन के विरुद्ध संघर्ष को जनांदोलन का स्वरूप देने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने ग्रामीणों को संगठित किया, उन्हें आत्मसम्मान और स्वतंत्रता का अर्थ समझाया। उनकी नेतृत्व क्षमता ने अनेक महिलाओं को प्रेरित किया कि वे भी हथियार उठाएँ और राष्ट्र की रक्षा करें। इस प्रकार कुयिली दक्षिण भारत की उन अग्रदूतों में सम्मिलित हैं, जिन्होंने महिलाओं की सक्रिय भूमिका का मार्ग प्रशस्त किया।

कुयिली और रानी वेलुनाच्चियार का संबंध केवल शासक और सेविका का नहीं था। यह संबंध मातृभूमि के प्रति समान समर्पण का था। जब रानी का राज्य नष्ट हो गया और वे निर्वासन में चली गईं, तब कुयिली ने भी अपने स्वामी के सुख में सुख और दुःख में दुःख साझा किया। उन्होंने रानी के पुनरुत्थान के लिए योजनाएँ बनाईं, सेनाओं का पुनर्गठन किया और सहयोगी राज्यों से संपर्क स्थापित किया। इस प्रकार कुयिली का योगदान केवल बलिदान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वे स्वतंत्रता संग्राम के संगठनात्मक पक्ष की भी प्रमुख हस्ती थीं।

कुयिली की वीरता इस तथ्य से और भी महान बन जाती है कि वे उस समय की सामाजिक रूप से पिछड़ी जाति से थीं। एक दलित महिला के रूप में उन्होंने उस युग में जो पराक्रम दिखाया, वह न केवल अंग्रेजों के लिए चुनौती था बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था के लिए भी, जो महिलाओं और निम्न वर्गों को हाशिये पर रखती थी। उनका यह कार्य स्वतंत्रता आंदोलन में सामाजिक समता और समान अधिकारों के विचार को भी पुष्ट करता है। उन्होंने यह सिद्ध किया कि देशभक्ति किसी जाति या वर्ग की नहीं होती, वह आत्मा की पुकार होती है।

आज जब हम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास की चर्चा करते हैं, तो अक्सर उत्तर भारत के आंदोलनकारियों और नेताओं के नाम ही प्रमुखता से याद किए जाते हैं। किंतु दक्षिण भारत की इन नायिकाओं का योगदान भी उतना ही महान और प्रेरणादायी है। कुयिली का बलिदान इस बात का साक्ष्य है कि स्वतंत्रता केवल पुरुषों के शौर्य से नहीं, बल्कि महिलाओं के आत्मत्याग से भी प्राप्त हुई है। उनके जीवन से यह संदेश मिलता है कि स्वतंत्रता कोई उपहार नहीं, बल्कि रक्त और आहुति से अर्जित किया गया अधिकार है।

कुयिली का चरित्र भारतीय नारीत्व के आदर्श का प्रतीक है। उन्होंने अपने कर्तव्य को व्यक्तिगत जीवन से ऊपर रखा। उनकी यह भावना हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या आज भी हम उतनी ही निष्ठा से राष्ट्र के प्रति समर्पित हैं, जितनी वह थीं। आधुनिक भारत में जब नारी-शक्ति के सशक्तिकरण की चर्चा होती है, तब कुयिली जैसी नायिकाएँ हमारे लिए प्रेरणा बनती हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि नारी केवल करुणा की प्रतिमा नहीं, बल्कि पराक्रम की ज्वाला भी बन सकती है।

स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास केवल दिल्ली, कोलकाता या मुंबई जैसे शहरों की घटनाओं तक सीमित नहीं था। वह गाँवों, जंगलों और छोटे-छोटे राज्यों तक फैला हुआ था, जहाँ कुयिली जैसी महिलाओं ने अदम्य साहस दिखाया। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रप्रेम किसी क्षेत्र या भाषा की सीमा में नहीं बंधा होता। कुयिली ने अंग्रेजों के अत्याचारों के विरुद्ध अपने अस्तित्व को दांव पर लगा दिया, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ स्वतंत्र वायु में सांस ले सकें।

कुयिली की आत्माहुति की घटना केवल युद्ध की नहीं, बल्कि चेतना की क्रांति थी। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि देशभक्ति केवल तलवार उठाने का नाम नहीं, बल्कि स्वयं को अर्पित करने का साहस भी है। उनकी यह भावना भारतीय आध्यात्मिकता से जुड़ी हुई थी — “स्वधर्मे निधनं श्रेयः।” उन्होंने अपने स्वधर्म, अपने कर्तव्य को सर्वोपरि मानते हुए अपने प्राणों का बलिदान दिया। यही वह भाव है जिसने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं, बल्कि नैतिक और आध्यात्मिक जागरण का रूप दिया।

कुयिली के बलिदान ने रानी वेलुनाच्चियार को पुनः शक्ति प्राप्त करने में सहायता की, जिन्होंने तत्पश्चात अंग्रेजों को परास्त कर शिवगंगा राज्य को पुनः स्वतंत्र किया। इस प्रकार कुयिली की आत्माहुति एक नए युग की शुरुआत थी। वह केवल एक घटना नहीं, बल्कि प्रतीक थी — स्वतंत्रता की ज्योति की, जो एक स्त्री के हृदय से प्रज्वलित हुई और जिसने पूरे दक्षिण भारत में स्वतंत्रता की चेतना फैलाई।

आज कुयिली को तमिलनाडु में “पहली स्वतंत्रता सेनानी” के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके नाम पर स्मारक बनाए गए हैं, परंतु राष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान अभी भी सीमित है। यह हमारे इतिहास की विडंबना है कि जिन्होंने अपने प्राणों से देश की रक्षा की, उन्हें भुला दिया गया। कुयिली की कहानी को विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किया जाना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी यह जान सके कि स्वतंत्रता की राह कितनी कठिन और पवित्र थी।

कुयिली का जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वह नहीं जो अवसर मिलने पर संघर्ष करे, बल्कि वह है जो प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अडिग रहे। उन्होंने कभी व्यक्तिगत लाभ या यश की कामना नहीं की, उनका एकमात्र उद्देश्य मातृभूमि की रक्षा था। उनके इस समर्पण में हमें भारतीय संस्कृति का सार दिखाई देता है — “त्याग से ही महानता प्राप्त होती है।”

यदि हम स्वतंत्रता आंदोलन को एक विराट वृक्ष मानें, तो कुयिली उसका वह बीज थीं, जिसने धरती में अपनी आहुति देकर इस वृक्ष को जीवन दिया। उनके बलिदान ने यह सिद्ध कर दिया कि नारी शक्ति जब संकल्प लेती है, तो इतिहास उसकी अग्नि से आलोकित होता है। उनका नाम उस स्वर्णिम पृष्ठ पर अंकित है, जहाँ भारत की असंख्य वीरांगनाओं ने अपने रक्त से स्वतंत्रता का इतिहास लिखा।

अतः यह निष्कर्ष स्पष्ट है कि कुयिली का योगदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रारंभिक चरण में अत्यंत महत्त्वपूर्ण था। उन्होंने अपने आत्मत्याग से न केवल ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी, बल्कि भारतीय समाज को यह सिखाया कि स्वतंत्रता का अर्थ केवल राजनीतिक स्वराज नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, समानता और कर्तव्यनिष्ठा भी है। कुयिली का बलिदान भारत की आत्मा में उस ज्योति के समान है, जो युगों तक अंधकार मिटाती रहेगी।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 110059

स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएं

(BFC पब्लिकेशन लखनऊ (उ०प्र०) के नवम्बर 2025 अंक में प्रकाशित)

प्रधान सम्पादक- डॉ सीताराम आठिया, पीएचडी, डी लिट (मानद)

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम विश्व इतिहास का एक अनोखा उदाहरण है, जहाँ पराधीनता की जंजीरों को तोड़ने के लिए लाखों स्त्री–पुरुषों ने अपने प्राण न्यौछावर किए। यह आंदोलन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना का जागरण था। इस महान संघर्ष में भारतीय महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही। जब समाज ने उन्हें घर की चारदीवारी तक सीमित कर रखा था, तब उन्होंने पुरुषों के समान कंधे से कंधा मिलाकर स्वतंत्रता के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। भारतीय नारी के भीतर जो शक्ति, सहनशीलता और मातृत्व का भाव था, वही स्वतंत्रता संग्राम के दौरान ‘शौर्य’ और ‘बलिदान’ में परिणत हुआ।

स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाओं ने यह सिद्ध किया कि राष्ट्रप्रेम किसी लिंग की सीमा में नहीं बंधता। उनका योगदान केवल युद्धों या आंदोलनों तक सीमित नहीं था; उन्होंने समाज-सुधार, शिक्षा, नारी-जागरण और आत्मनिर्भरता जैसे क्षेत्रों में भी प्रेरणादायक भूमिका निभाई। मैं इस शोध पत्र उन वीरांगनाओं की गाथा को प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा हूं, जिन्होंने इतिहास में अमरता प्राप्त की, पर जिनकी आत्मा आज भी राष्ट्र के कण-कण में स्पंदित है।

प्रथम स्वतंत्रता संग्राम और नारी-जागरण का उदय

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भारतीय चेतना का विस्फोट था। यह केवल सैनिकों का विद्रोह नहीं था, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की पुकार थी। इस संग्राम में महिलाओं ने भी अभूतपूर्व साहस दिखाया। उस समय समाज में स्त्रियों की भूमिका सीमित थी, परंतु जब देश की अस्मिता पर संकट आया, तो उन्होंने समाज की मर्यादाओं को तोड़कर शस्त्र उठाए। इसी काल की अनेक वीरांगनाएं भारतीय इतिहास की प्रेरणा बन गईं।

रानी लक्ष्मीबाई : स्वतंत्रता की अमर ज्वाला

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की सबसे तेजस्वी प्रतीक हैं। 1828 में वाराणसी में जन्मी लक्ष्मीबाई का बचपन मणिकर्णिका के रूप में बीता। वे घुड़सवारी, तलवारबाजी और युद्धकला में निपुण थीं। जब ब्रिटिश शासन ने ‘डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स’ के तहत झांसी को हड़पने का प्रयास किया, तो उन्होंने कहा — “मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी।” यह वाक्य भारतीय इतिहास में अमर हो गया।

1857 के संग्राम में उन्होंने अपने छोटे पुत्र को पीठ पर बाँधा और अंग्रेज़ों से मोर्चा लिया। उन्होंने झांसी के किले से लेकर ग्वालियर तक वीरता से युद्ध किया। अंततः 1858 में ग्वालियर के समीप वे वीरगति को प्राप्त हुईं, पर उनकी मृत्यु ने पूरे भारत में स्वतंत्रता की ज्वाला प्रज्वलित कर दी। रानी लक्ष्मीबाई ने यह सिद्ध किया कि भारतीय नारी केवल गृहिणी नहीं, बल्कि राष्ट्र की रक्षा के लिए रणचंडी बन सकती है।

बेगम हजरत महल : अवध की शेरनी

अवध की रानी बेगम हजरत महल भी 1857 के विद्रोह की महान नायिका रहीं। नवाब वाजिद अली शाह के निर्वासन के बाद उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का नेतृत्व किया। उन्होंने अपने पुत्र बिरजिस कादर को गद्दी पर बैठाया और लखनऊ को अंग्रेज़ी शासन से मुक्त कराने के लिए संघर्ष किया। बेगम ने समाज के विभिन्न वर्गों को एकजुट कर यह दिखाया कि स्वतंत्रता किसी एक धर्म या जाति की नहीं, बल्कि सम्पूर्ण भारत की आकांक्षा है।

उनका साहस, राजनीतिक समझ और संगठन क्षमता अद्वितीय थी। उन्होंने साम्प्रदायिक एकता और जनसंगठन के माध्यम से ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी। यद्यपि बाद में उन्हें नेपाल में शरण लेनी पड़ी, लेकिन उनका नाम भारतीय स्वतंत्रता की गाथा में स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया।

उदा देवी : दलित चेतना की प्रथम वीरांगना

1857 के संग्राम में उदा देवी का योगदान दलित चेतना और स्त्री-शौर्य का अद्वितीय उदाहरण है। वे अवध की पासी वो वे से थीं और रानी अहिल्या बाई की महिला सेना का हिस्सा थीं। लखनऊ के सिकंदर बाग़ युद्ध में उन्होंने पेड़ की डाल पर बैठकर अंग्रेज़ सैनिकों पर गोलियाँ बरसाईं और अंततः वीरगति प्राप्त कीं। उदा देवी ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता का अधिकार किसी जाति या वर्ग का नहीं, बल्कि हर भारतीय का है।

कस्तूरबा गांधी : सत्याग्रह की आत्मा

महात्मा गांधी की सहधर्मिणी कस्तूरबा गांधी का योगदान भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक और आध्यात्मिक पक्ष का प्रतीक है। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक गांधीजी के हर आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। जब गांधीजी जेल गए, तब उन्होंने महिलाओं को संगठित कर आंदोलनों का नेतृत्व संभाला।

कस्तूरबा का संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था। उन्होंने समाज में स्वच्छता, शिक्षा, अस्पृश्यता-निवारण और नारी-सशक्तिकरण के लिए भी कार्य किया। वे मानती थीं कि स्वतंत्रता तभी सार्थक है जब समाज की आत्मा पवित्र हो। साबरमती और सेवाग्राम आश्रमों में उन्होंने स्वावलंबन का आदर्श प्रस्तुत किया।

सरोजिनी नायडू : कवयित्री और कर्मयोगिनी

सरोजिनी नायडू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की कोमल किंतु प्रखर आवाज़ थीं। उनका व्यक्तित्व कला, साहित्य और राजनीति तीनों का अद्भुत संगम था। 1917 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की पहली महिला अध्यक्ष बनीं। गांधीजी के असहयोग और नमक सत्याग्रह में उन्होंने अग्रणी भूमिका निभाई।

उनकी वाणी में कविता की मधुरता थी, पर विचारों में राष्ट्रवाद की दृढ़ता। उन्होंने महिलाओं को सामाजिक जीवन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया और कहा — “नारी अब मौन नहीं रहेगी; वह राष्ट्र की स्वर बनेगी।” सरोजिनी नायडू ने भारतीय स्त्रियों को राजनीतिक नेतृत्व का साहस दिया।

अन्नी बेसेन्ट : विदेशी होते हुए भी भारतीय आत्मा

अन्नी बेसेन्ट का जन्म इंग्लैंड में हुआ, पर भारत आने के बाद उन्होंने भारतीय संस्कृति को आत्मसात कर लिया। वे थियोसोफिकल सोसाइटी की प्रमुख थीं और उन्होंने भारतीय स्वराज्य आंदोलन में सक्रिय भाग लिया। 1916 में उन्होंने होमरूल लीग की स्थापना की, जिसने स्वराज की मांग को जन-आंदोलन बना दिया।

अन्नी बेसेन्ट ने कहा था — “भारत की आत्मा को केवल भारत ही नहीं, पूरी मानवता को मार्ग दिखाना है।” उन्होंने शिक्षा, समानता और आत्मबल के माध्यम से भारतीय समाज को नया आत्मविश्वास दिया।

अरुणा आसफ अली : स्वतंत्रता की ध्वजवाहक

1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में अरुणा आसफ अली का योगदान ऐतिहासिक रहा। जब सभी वरिष्ठ नेता जेलों में बंद थे, तब उन्होंने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराया। यह क्षण स्वतंत्रता आंदोलन का प्रतीक बन गया। अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें ‘आउटलॉ’ घोषित किया, पर वे भूमिगत रहकर आंदोलन को आगे बढ़ाती रहीं।

अरुणा आसफ अली ने अपने लेखन और भाषणों के माध्यम से महिलाओं को प्रेरित किया कि वे अब केवल दर्शक नहीं, बल्कि क्रांतिकारी बनें। आज़ादी के बाद भी उन्होंने सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के लिए कार्य किया।

कैप्टन लक्ष्मी सहगल : आज़ाद हिंद फौज की शूरवीर नारी

सुभाषचंद्र बोस द्वारा गठित आज़ाद हिंद फौज की ‘रानी झांसी रेजीमेंट’ की कमांडर कैप्टन लक्ष्मी सहगल भारतीय स्त्रियों के सशस्त्र संघर्ष का प्रतीक हैं। उन्होंने युवतियों को प्रशिक्षण देकर उन्हें देश की रक्षा के लिए तैयार किया। उनका यह कथन प्रसिद्ध है — “भारत की बेटियाँ तलवार उठाने से नहीं डरेंगी।”

लक्ष्मी सहगल का जीवन राष्ट्रसेवा का उदाहरण है। उन्होंने स्वतंत्रता के बाद भी चिकित्सा के क्षेत्र में समाजसेवा जारी रखी। उनके जीवन में अनुशासन, समर्पण और मातृभूमि-भक्ति का अद्भुत संगम था।

क्रांतिकारी महिला योद्धाएँ : दुर्गा भाभी, कल्पना दत्त और प्रीतिलता वादेदार

क्रांतिकारी आंदोलन में अनेक महिलाओं ने गोपनीय कार्यों के माध्यम से ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। दुर्गा भाभी (दुर्गावती देवी) ने भगत सिंह और राजगुरु को फरारी में सहायता दी। उन्होंने हथियारों की आपूर्ति और ब्रिटिश पुलिस से बचने में सक्रिय भूमिका निभाई।

कल्पना दत्त और प्रीतिलता वादेदार ने चिटगांव विद्रोह में मास्टरदा सूर्य सेन के साथ मिलकर अंग्रेज़ों के ठिकानों पर आक्रमण किए। प्रीतिलता ने आत्मबलिदान कर दिया, पर उनका साहस बंगाल के युवाओं के लिए प्रेरणा बना।

इन महिलाओं ने यह दिखाया कि स्वतंत्रता की ज्योति केवल विचारों से नहीं, बल्कि कर्म और बलिदान से प्रज्वलित होती है।

महिलाओं का सामाजिक और वैचारिक योगदान

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महिलाओं ने केवल आंदोलन में भाग नहीं लिया, बल्कि समाज के पुनर्निर्माण की नींव रखी। उन्होंने शिक्षा का प्रसार किया, नारी-अधिकारों की आवाज़ उठाई, बाल-विवाह और पर्दा-प्रथा के विरुद्ध कार्य किया।

एनी बेसेन्ट, कमला नेहरू, विजयलक्ष्मी पंडित, सुचेता कृपलानी और राजकुमारी अमृत कौर जैसी महिलाओं ने शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुधार के क्षेत्र में स्थायी परिवर्तन लाए। इन प्रयासों से भारतीय नारी केवल स्वतंत्रता की सेनानी नहीं, बल्कि समाज-निर्माता के रूप में उभरी।

नारी चेतना और राष्ट्र चेतना का संगम

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नारी चेतना और राष्ट्र चेतना एक-दूसरे में विलीन हो गए। स्त्रियों ने मातृत्व के विस्तार के रूप में राष्ट्र को देखा। उनके लिए ‘भारत माता’ केवल प्रतीक नहीं, बल्कि सजीव अनुभूति थी। जब रानी लक्ष्मीबाई ने तलवार उठाई, जब कस्तूरबा ने सत्याग्रह किया, जब सरोजिनी नायडू ने तिरंगा फहराया—तब उन्होंने यह दिखाया कि राष्ट्रभक्ति नारीत्व का सर्वोच्च रूप है।

स्वतंत्रता के बाद की भूमिका

आज़ादी के बाद भी इन वीरांगनाओं की प्रेरणा समाप्त नहीं हुई। स्वतंत्र भारत की संविधान सभा, संसद और समाज में महिलाएँ नेतृत्व करने लगीं। सुचेता कृपलानी उत्तर प्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, विजयलक्ष्मी पंडित संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनीं। यह सब उन वीरांगनाओं के संघर्ष का ही परिणाम था जिन्होंने नारी के अधिकारों की नींव रखी।

निष्कर्ष

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगनाएं केवल इतिहास की घटनाएँ नहीं, बल्कि भारत की आत्मा की सजीव प्रतिमाएं हैं। उन्होंने यह दिखाया कि जब स्त्री अपने भीतर के दिव्य बल को पहचानती है, तो वह राष्ट्र की दिशा बदल सकती है। रानी लक्ष्मीबाई की तलवार, बेगम हजरत महल की दृढ़ता, कस्तूरबा गांधी की तपस्या, सरोजिनी नायडू की वाणी, अरुणा आसफ अली का साहस, और लक्ष्मी सहगल की नेतृत्व क्षमता — ये सब मिलकर भारतीय नारी का वह विराट रूप प्रस्तुत करते हैं जो सृजन और संहार दोनों में सक्षम है।

इन वीरांगनाओं का योगदान केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने भारतीय समाज में नारी के सम्मान और समानता की नींव रखी। आज जब हम स्वतंत्र भारत के नागरिक हैं, तब हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि हमारी आज़ादी उनके त्याग, तप और आत्मबल की परिणति है।

वे केवल इतिहास नहीं — वे चेतना हैं, प्रेरणा हैं, और भारतीय नारीत्व की शाश्वत ज्योति हैं।

उनकी गाथा यह सिखाती है कि राष्ट्र तभी जीवित रहता है जब उसकी बेटियाँ निर्भय होकर उसके सम्मान की रक्षा के लिए खड़ी होती हैं।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 110059

पंडित दीनदयाल उपाध्याय और आधुनिक भारत – (शोधपत्र)

(विश्व हिंदी परिषद द्वारा पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की 110वीं जयंती के शुभ अवसर पर आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन — 21–22 नवम्बर, 2025, विज्ञान भवन, नई दिल्ली — के उपलक्ष्य में प्रकाशित पत्रिका में सम्मिलित)

प्रधान सम्पादक- डॉ सीताराम आठिया, पीएचडी, डी लिट (मानद)

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी आधुनिक भारत के उन युगनिर्माताओं में से एक हैं, जिन्होंने राजनीति को केवल सत्ता का साधन न मानकर उसे समाज–सेवा और राष्ट्र–पुनर्निर्माण का उपकरण माना। उन्होंने भारतीय चिंतन परंपरा से प्रेरित होकर ‘एकात्म मानववाद’ की विचारधारा को प्रस्तुत किया, जो भारतीय संस्कृति, धर्म, अर्थ, नीति और समाज–व्यवस्था के समन्वित दर्शन का जीवंत रूप है। पंडितजी के चिंतन का मूल लक्ष्य “अंत्योदय” था, अर्थात समाज के अंतिम व्यक्ति का उत्थान करना। उनके विचारानुसार विकास तभी सार्थक है, जब उसका लाभ उस व्यक्ति तक पहुँचे जो सबसे पीछे है। इस शोध–पत्र के माध्यम से मैं पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के जीवन, उनके एकात्म मानव दर्शन, अंत्योदय सिद्धांत और आधुनिक भारत में उनकी प्रासंगिकता का विस्तार से विश्लेषण करने का प्रयास कर रहा हूं।

प्रस्तावना
स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती थी कि राष्ट्रनिर्माण के लिए ऐसा विचार–आधार विकसित करना जो न केवल पश्चिमी चिंतन की नकल हो, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा और संस्कृति के अनुरूप भी हो। इसी आवश्यकता की पूर्ति पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने की। उन्होंने भारत की राजनीतिक दिशा को सांस्कृतिक और नैतिक दृष्टिकोण से जोड़ा। जहाँ पश्चिम ने व्यक्ति को समाज से पृथक कर देखा, वहीं पंडितजी ने व्यक्ति, समाज और राष्ट्र इन तीनों को एकात्म स्वरूप में परिभाषित किया।

उनके अनुसार, “राष्ट्र केवल भूमि का टुकड़ा नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना है, जिसके भीतर करोड़ों व्यक्तियों का सामूहिक आत्मा निवास करती है।” आधुनिक भारत के विकास के लिए यह विचार आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना स्वतंत्रता के बाद था।

पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का जीवन एवं विचार–यात्रा
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५ सितंबर १९१६ को मथुरा जिले के नगला चंद्रभान ग्राम में हुआ। प्रारंभिक जीवन संघर्षपूर्ण रहा, परंतु उन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी शिक्षा को अपना संबल बनाया। वे राजस्थान, कानपुर और आगरा में शिक्षित हुए। प्रारंभ से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े और संघ की संगठनात्मक शक्ति को सामाजिक जागरण का माध्यम बनाया।

उनका जीवन साधारण था, परंतु उनके विचार असाधारण थे। उन्होंने कभी निजी स्वार्थ या राजनीतिक लाभ की चिंता नहीं की। उनका समस्त जीवन राष्ट्र–सेवा, समाज–सुधार और मानवीय मूल्य–स्थापना के लिए समर्पित रहा। पंडितजी मानते थे कि राजनीति तभी सार्थक है, जब वह समाज के नैतिक और आध्यात्मिक उत्थान का साधन बने।

एकात्म मानववाद : भारतीय दर्शन का सामाजिक स्वरूप
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी की विचार धारा एकात्म मानववाद भारतीय संस्कृति का समन्वित दर्शन है। यह न तो पूँजीवाद की तरह भौतिकता पर आधारित है और न ही साम्यवाद की तरह वर्ग–संघर्ष पर निर्भर था। यह भारतीय जीवन–दृष्टि पर आधारित ऐसा विचार है, जो मनुष्य को शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा इन चारों स्तरों पर विकसित करने की बात करता है।

उन्होंने कहा — “मनुष्य केवल आर्थिक प्राणी नहीं, वह आध्यात्मिक भी है। जब तक हम उसके आत्मिक पक्ष की उपेक्षा करेंगे, तब तक समाज का सम्यक विकास संभव नहीं।”

एकात्म मानववाद का तात्पर्य है कि सभी का समन्वय, विरोध नहीं। यह दर्शन व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य स्थापित करता है और राष्ट्र को एक सजीव अंग के रूप में देखता है।

‘अंत्योदय’ : समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय
पंडित दीनदयाल उपाध्याय का सबसे प्रसिद्ध सिद्धांत “अंत्योदय” है। इसका अर्थ है कि समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय या उत्थान होना। उनके अनुसार, जब तक समाज का सबसे गरीब, सबसे वंचित और सबसे निर्बल व्यक्ति भी विकास का लाभ नहीं पाता, तब तक राष्ट्र का उत्थान अधूरा है।

वे कहते थे —
“हमारी नीति का आधार केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा की पुनर्स्थापना होना चाहिए।”

अंत्योदय का यह भाव गांधीजी के ‘सर्वोदय’ से जुड़ता है, परंतु पंडितजी ने इसे और व्यवहारिक रूप दिया। उन्होंने कहा कि राज्य–नीतियों का लक्ष्य सुख–सुविधा का नहीं, बल्कि आत्म–निर्भरता और स्वाभिमान का विकास होना चाहिए।

राजनीति में नैतिकता और सेवा का आदर्श
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का राजनीतिक दृष्टिकोण अत्यंत शुद्ध और नैतिक था। वे राजनीति को “सेवा का माध्यम” मानते थे, न कि “सत्ता प्राप्ति का उपकरण।”

उनके अनुसार —
“राजनीति का अर्थ केवल शासन नहीं, अपितु समाज का मार्गदर्शन भी है।”

उन्होंने भारतीय जनसंघ के माध्यम से राजनीति में वैचारिक शुचिता और संगठनात्मक अनुशासन का संचार किया। उनके नेतृत्व में राजनीति में ‘राष्ट्र–धर्म’ और ‘नैतिक नीति’ की चर्चा प्रारंभ हुई। वे मानते थे कि यदि राजनीति से नैतिकता हट जाए, तो वह केवल स्वार्थ की प्रतिस्पर्धा बनकर रह जाती है।

एकात्म मानववाद और आधुनिक विकास दृष्टि
आधुनिक भारत में विकास प्रायः आर्थिक वृद्धि दर और औद्योगिक उत्पादन के आँकड़ों से मापा जाता है, परंतु पंडित उपाध्याय जी ने इसे मानवीय दृष्टिकोण से परिभाषित किया।

उन्होंने कहा —
“विकास का अर्थ GDP नहीं, बल्कि मानव की पूर्णता है।”

उनके अनुसार, जब तक विकास शिक्षा, स्वास्थ्य, चरित्र, और पर्यावरण के साथ सामंजस्य न रखे, तब तक वह स्थायी नहीं हो सकता। उन्होंने “आत्म–निर्भर ग्राम–व्यवस्था”, “स्थानीय रोजगार” और “भारतीय स्वदेशी उद्योग” को विकास का आधार बताया।

उनकी दृष्टि में विकास का अर्थ केवल संसाधनों की वृद्धि नहीं, बल्कि मानवता के भाव का संवर्धन था।

भारतीय संस्कृति और राष्ट्रवाद का संबंध
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का राष्ट्रवाद किसी भौगोलिक सीमा का नहीं, बल्कि सांस्कृतिक चेतना का था। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सदैव समावेशी, सर्वधर्म–समभाव और आत्मीयता की प्रतीक रही है।
उनका राष्ट्रवाद संस्कृति–निष्ठ राष्ट्रवाद था, जो भारत की विविधता में एकता को स्वीकार करता है।

उनके अनुसार, भारत का राष्ट्र–जीवन केवल राजनीतिक ढाँचा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक चेतना का प्रवाह है। इसीलिए उन्होंने “भारत माता” को केवल भूमि नहीं, बल्कि जीवंत मातृशक्ति के रूप में देखा।

वे कहते थे —
“जब तक हम अपनी संस्कृति की आत्मा को नहीं पहचानेंगे, तब तक सच्चा राष्ट्र निर्माण नहीं कर सकते।”

सामाजिक समरसता और अखंडता का दृष्टिकोण
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने सामाजिक विषमता, जातिवाद और आर्थिक असमानता को राष्ट्र की एकता के लिए सबसे बड़ा खतरा माना। उन्होंने ‘समरस समाज’ का आदर्श प्रस्तुत किया, जहाँ किसी व्यक्ति को जाति, भाषा या धर्म के आधार पर विभाजित न किया जाए।

वे कहते थे कि भारतीय समाज का बल उसकी विविधता में एकता है। इस विविधता को समाप्त नहीं, बल्कि संतुलित करना आवश्यक है। उनके अनुसार, जब व्यक्ति में समाज–भाव और समाज में व्यक्ति–भाव जागृत होता है, तभी सच्ची अखंडता संभव है।

आर्थिक चिंतन : स्वदेशी, विकेंद्रीकरण और आत्मनिर्भरता
पंडितजी ने भारत की आर्थिक नीति के लिए स्वदेशी और विकेंद्रीकृत मॉडल का समर्थन किया। उन्होंने कहा कि विदेशी पूँजी और औद्योगिक केंद्रीकरण से समाज में असमानता बढ़ती है।

उनकी दृष्टि में ग्राम–आधारित अर्थ–व्यवस्था ही भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप है।

उन्होंने सुझाव दिया कि विकास की प्रक्रिया नीचे से ऊपर (Bottom–Up) होनी चाहिए यानि गाँव से राष्ट्र की ओर। यह दृष्टिकोण आज के स्थायी विकास (Sustainable Development) की अवधारणा से मेल खाती है।

वे कहते थे —
“आर्थिक नीति का उद्देश्य केवल उत्पादन नहीं, बल्कि वितरण में न्याय और श्रम का सम्मान होना चाहिए।”

आधुनिक भारत में पंडित उपाध्याय जी की प्रासंगिकता
आज का भारत तीव्र औद्योगिकीकरण, उपभोक्तावाद और प्रतिस्पर्धा के युग में है। इस स्थिति में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का विचार–दर्शन और भी अधिक सार्थक हो जाता है।

उनकी ‘एकात्म मानववाद’ की भावना आज की शिक्षा नीति, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, स्वावलंबन, सामाजिक समरसता और आत्म–निर्भर भारत अभियान में स्पष्ट झलकती है।

अंत्योदय योजना, जन–धन योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत अभियान जैसी अनेक नीतियाँ उनके सिद्धांत की आधुनिक अभिव्यक्ति हैं — जिनका उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाना है।

निष्कर्ष
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी केवल एक राजनेता नहीं, बल्कि भारत की आत्मा के दार्शनिक थे। उन्होंने पश्चिमी भौतिकतावाद और पूर्वी अध्यात्मवाद का ऐसा संगम प्रस्तुत किया, जो आज के भारत को संतुलन और स्थिरता प्रदान कर सकता है।

उनका ‘एकात्म मानववाद’ केवल एक राजनीतिक विचार नहीं, बल्कि जीवन–दर्शन है। जो हमें सिखाता है कि व्यक्ति, समाज और राष्ट्र — तीनों एक ही चेतना के अंग हैं।

उनका ‘अंत्योदय’ केवल नीति नहीं, बल्कि करुणा, समानता और सेवा का व्यावहारिक स्वरूप है।

आधुनिक भारत के लिए उनका संदेश स्पष्ट है —
“विकास तभी पूर्ण होगा जब प्रत्येक व्यक्ति में आत्म–बल, समाज–भाव और राष्ट्र–प्रेम जागृत होगा।”

यही उनके विचारों का सार आज आधुनिक भारत के लिए स्थायी मार्गदर्शन है।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 11005

महाकाल की महाकाली

प्रकाशक: प्रतीक्षा गाँगुली नाथ, शिवोहम पब्लिकेशन, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) द्वारा ‘महाकाल की महाकाली’ पत्रिका में नवम्बर 2025 में प्रकाशित।

महाकाल की महाकाली, रूप अद्भुत अपार,
शक्ति और भक्ति का संदेश फैलाए संसार।
अंधकार मिटाए, भय और अज्ञान का नाश,
भक्तों के हृदय में जलाए दिव्य प्रकाश।

महाकाल की महाकाली का आदर्श महान,
सत्य, धर्म और प्रेम से बने जीवन महान।
भक्ति में लीन मनुष्य पाए आत्मा का आधार,
शिव और शक्ति के संग जीवन बने अजर-अमर।

महाकाल की महाकाली, अनंत महिमा अपार,
भक्ति और साधना से मिले उनका आशीष विशाल।
जीवन बने प्रेम, शक्ति और धर्म का दीपशिखा,
भक्तिपूर्ण मनुष्य पाए उद्धार का प्रकाशमान।

महाकाल की महाकाली, अज्ञान पर करे विजय,
भक्तों के मन में जलाए ज्ञान और विवेक का दीप।
संकट और भय को हरें, करुणा की छाया फैलाए,
धर्म और प्रेम के पथ पर जीवन को उजियार बनाए।

महाकाल की महाकाली, साहस का है परिचय,
अंधकार में चमके दीप, दिखाए सत्य का मार्ग।
भक्ति में लीन मनुष्य पाए आत्मा का शांति आधार,
शिव और शक्ति के संग जीवन बने अजर-अमर।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 11005

प्यार का दीप – भाई दूज

प्रकाशक: प्रतीक्षा गाँगुली नाथ, शिवोहम पब्लिकेशन, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) द्वारा ‘भाई-दूज’ पत्रिका में नवम्बर 2025 में प्रकाशित।

भाई दूज का यह प्यारा त्यौहार आया,
भाई-बहन का अटूट प्रेम जो है लाया।
बहन ने भाई के माथे पर तिलक सजाया,
भाई ने अपनापन और सुरक्षा का वचन दिया।

भाई दूज है बंधन, विश्वास का है यह आधार,
भाई और बहन का प्रेम, जो अनमोल उपहार।
दोनों साथ रहें जीवन भर, चाहे दूर हों या पास,
भाई दूज का ये पर्व प्रेम का दीपक है अति खास।

भाई दूज का दिन, सुख-शांति का संदेश लाए,
हर घर में खुशियाँ, प्रेम और उमंग छाए।
भाई-बहन का ये बंधन हमेशा आता जाए,
जीवन में स्नेह, स्वास्थ्य और समृद्धि आए।

भाई दूज की रौनक, हर आंगन में बिखरे,
मिठाइयों की खुशबू, हर मन को भिगोए।
हँसी, खेल और मस्ती से दिन ये सजता,
स्नेह के रंगों से घर-आँगन ये रोशन होए।

भाई दूज का दिन लाए, रिश्तों में मिठास,
बहन करे आरती, भाई देता है नित विश्वास।
प्रेम-स्नेह की किरण से, जग में फैले प्रकाश,
ऐसे पावन बंधन को, मिले अमर उल्लास।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 11005

छठ पूजा — पर्व नहीं प्यार

प्रकाशक: प्रतीक्षा गाँगुली नाथ, शिवोहम पब्लिकेशन, कलकत्ता (पश्चिम बंगाल) द्वारा ‘छठ-पूजा’ पत्रिका में नवम्बर 2025 में प्रकाशित।

छठ पूजा: प्रेम और सामंजस्य का पर्व
छठ पूजा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह आत्मीयता, स्नेह और प्रेम का प्रतीक है। यह पर्व सूर्य देवता की आराधना का माध्यम तो है ही, साथ ही परिवार और समाज में आपसी मेल, सहयोग और सामंजस्य को भी मजबूती देता है। लोकजीवन में इसका महत्व गहरा है, क्योंकि यह लोगों को अपनी परंपराओं, संस्कारों और प्राकृतिक तत्वों के साथ जोड़ता है। उपवास, संकल्प, सूर्यास्त और सूर्योदय के समय स्नान और पूजा केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं हैं, बल्कि ये मानव हृदय में सच्चे प्रेम, श्रद्धा और संयम की भावना को जाग्रत करते हैं। इस पर्व के दौरान श्रद्धालु अपने जीवन और परिवार के लिए समर्पण, त्याग और तपस्या करते हैं, जिससे आस्था और भावनात्मक जुड़ाव गहरा होता है।

छठ पूजा: प्राचीन परंपरा और सांस्कृतिक प्रतीक
छठ पूजा का इतिहास अत्यंत प्राचीन है और इसके पौराणिक संदर्भ सूर्य देवता की आराधना और प्राकृतिक चक्र के सम्मान से जुड़े हैं। सूर्य को जीवन का दाता माना गया है और छठ पर्व में सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा मानव और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है। महाभारत और पुराणों में सूर्य की पूजा और उपासना का विस्तृत उल्लेख मिलता है, जिसमें उनकी शक्ति, स्वास्थ्य और समृद्धि देने वाले स्वरूप का वर्णन है। समय के साथ, छठ पूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसका सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व भी बढ़ता गया। यह पर्व लोकजीवन में प्रेम, सहयोग, पारिवारिक मेल-जोल और प्राकृतिक तत्वों के प्रति सम्मान की भावना जाग्रत करता है। इस तरह, छठ पूजा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान, बल्कि संस्कृति, भक्ति और सामाजिक संबंधों का जीवंत प्रतीक बन गई है।

छठ पूजा: अनूठी परंपराएँ और सामाजिक एकता
छठ पूजा की परंपराएँ अत्यंत अनूठी और हृदयस्पर्शी हैं। पर्व की शुरुआत स्नान और भोजन से होती है, जिसमें शुद्धता और संयम का महत्व झलकता है। रात्रि का विशेष व्रत-भोजन और सत्संग व्रतधारी को भक्ति और ऊर्जा का संतुलन प्रदान करते हैं। डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देना इस पर्व का केंद्रबिंदु है, जो जीवन और प्रकृति के चक्र में मानव की सहभागिता को दर्शाता है। साथ ही, छठ पूजा पारिवारिक और सामुदायिक मिलन का अवसर भी बनती है, जहाँ लोग घाटों पर एकत्रित होकर पूजा करते हैं और आपसी स्नेह तथा सहयोग की भावना को प्रबल करते हैं। इस प्रकार, छठ पूजा केवल पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, भक्ति और सामाजिक एकता का जीवंत प्रतीक बनती है।

छठ पूजा: सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना
छठ पूजा का सामाजिक और सांस्कृतिक आयाम अत्यंत गहन है। यह समाज में भाईचारा, मेल-जोल और सहयोग की भावना को मजबूत करता है। गाँव और शहर में इसका उत्सव भिन्न रूपों में मनाया जाता है, लेकिन हर जगह यह समुदाय को एकजुट करता है और पारिवारिक तथा सामाजिक संबंधों को सुदृढ़ करता है। इस पर्व में महिलाओं की प्रमुख भूमिका होती है; उनका संयम, तपस्या और समर्पण पूजा की आत्मा को जीवंत बनाता है। उपवास, घाट पर अर्घ्य देना और पारिवारिक सहयोग केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि समाज में स्नेह, अनुशासन और सामूहिक सौहार्द की भावना को जन्म देती हैं। इस प्रकार छठ पूजा न केवल भक्ति और आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक चेतना का उत्सव भी है।

छठ पूजा: प्रेम, सामंजस्य और आध्यात्मिक चेतना
छठ पूजा केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं है, बल्कि यह व्यक्तियों के बीच स्नेह, अपनत्व और सामंजस्य का प्रतीक है। पूजा के माध्यम से परिवार और समाज में प्रेम, सहयोग और समझदारी की भावना का संचार होता है, जो रिश्तों को मजबूत और जीवन को संतुलित बनाता है। स्नान और भोजन, रात्रि का विशेष व्रत-भोजन, सत्संग और सूर्य को अर्घ्य देने जैसी परंपराएँ न केवल धार्मिक क्रियाएँ हैं, बल्कि त्याग, संयम और तपस्या की उच्च मानवीय मूल्याओं को व्यक्त करती हैं। व्रतधारी का संकल्प और समर्पण भावनात्मक जुड़ाव को गहरा करता है, जिससे हर व्यक्ति अपने परिवार, समाज और प्रकृति के साथ गहरा संबंध अनुभव करता है। इस प्रकार, छठ पूजा केवल भक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि प्रेम, सामाजिक सामंजस्य और आध्यात्मिक चेतना का उत्सव है।

छठ पूजा: आधुनिक जीवन और वैश्विक सांस्कृतिक प्रभाव
आधुनिक संदर्भ में छठ पूजा शहरी जीवन में भी अपनी महत्ता बनाए हुए है। तेज़ रफ्तार जीवन और व्यस्त दिनचर्या के बीच यह पर्व लोगों को परिवार और समुदाय से जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। सोशल मीडिया और डिजिटल जागरूकता के माध्यम से छठ पूजा का संदेश घर-घर और देश-विदेश तक फैल रहा है, जिससे प्रेम, सहयोग और पारिवारिक बंधनों की भावना और मजबूत हो रही है। वैश्विक स्तर पर प्रवासी समुदायों के माध्यम से छठ पूजा का सांस्कृतिक प्रभाव बढ़ा है; यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि भारत की समृद्ध परंपरा और सामाजिक मूल्यों का प्रतिनिधित्व बन गई है। आधुनिक शहरी जीवन में यह पर्व न केवल आध्यात्मिक और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करता है, बल्कि वैश्विक समुदाय में प्रेम, सहिष्णुता और सांस्कृतिक चेतना के प्रसार का भी माध्यम बनता है।

निष्कर्ष: छठ पूजा – प्रेम, श्रद्धा और एकता का पर्व
अतः, छठ पूजा केवल एक पारंपरिक पर्व नहीं है, बल्कि इसका वास्तविक संदेश प्रेम, श्रद्धा और सामंजस्य की भावना को जीवंत करना है। यह पर्व हमें सिखाता है कि भक्ति केवल धार्मिक क्रियाएँ नहीं, बल्कि रिश्तों में अपनापन, समाज में सहयोग और जीवन में सामंजस्य का आधार भी है। स्नान और भोजन, रात्रि का विशेष व्रत-भोजन, सूर्य को अर्घ्य देने और सत्संग जैसी परंपराएँ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रेम, त्याग और तपस्या के माध्यम से भावनात्मक जुड़ाव और सामाजिक एकता को मजबूत करती हैं। इसलिए छठ पूजा केवल त्योहार नहीं, बल्कि जीवन में प्यार, समझदारी और एकता का पर्व है, जो व्यक्ति और समुदाय दोनों के हृदय में श्रद्धा, स्नेह और सामाजिक सौहार्द की भावना को प्रबल करती है।

✍️ योगेश गहतोड़ी “यश”
(ज्योतिषाचार्य)
मोबाईल: 9810092532
नई दिल्ली – 11005


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